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न्याय दर्शन क्या है? प्रमाण, तर्क और मोक्ष का वैज्ञानिक दर्शन | Nyaya Darshan Explained



न्याय दर्शन (Nyāya Darśana) : तर्क, प्रमाण और सत्य का वैदिक विज्ञान Complete Guide


प्रस्तावना : न्याय दर्शन का स्थान भारतीय दर्शन में

न्याय दर्शन भारतीय षड्दर्शन परम्परा का वह दर्शन है जो तर्क (Logic), प्रमाण (Epistemology) और युक्ति के माध्यम से सत्य तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। यदि वेदान्त दर्शन आत्मानुभूति का शिखर है, तो न्याय दर्शन उस शिखर तक पहुँचने की बौद्धिक सीढ़ी है। इसे भारतीय तर्कशास्त्र (Indian Logic) की आधारशिला माना जाता है।

न्याय दर्शन का मूल ग्रंथ न्यायसूत्र है, जिसके रचयिता महर्षि गौतम (अक्षपाद) माने जाते हैं। न्याय दर्शन का उद्देश्य केवल वाद-विवाद नहीं, बल्कि मिथ्या ज्ञान (अविद्या) का नाश कर यथार्थ ज्ञान द्वारा मोक्ष की प्राप्ति है।


न्याय दर्शन की वैदिक पृष्ठभूमि

यद्यपि न्याय दर्शन एक स्वतंत्र दर्शन के रूप में विकसित हुआ, पर इसका मूल वेद और उपनिषद में ही निहित है। उपनिषदों में जहाँ प्रत्यक्ष ब्रह्मानुभूति है, वहीं न्याय दर्शन उस अनुभूति तक पहुँचने के लिए ज्ञान की शुद्धि करता है।

वेदों में कहा गया है –

"सत्येन पन्था विततो देवयानः"

न्याय दर्शन इसी सत्य के पथ को तर्क और प्रमाण से स्पष्ट करता है।


न्याय दर्शन का उद्देश्य

न्याय दर्शन का मुख्य उद्देश्य है:

  • यथार्थ ज्ञान (प्रमा) की प्राप्ति
  • मिथ्या ज्ञान (अप्रमा) का नाश
  • दुःखों से पूर्ण निवृत्ति
  • मोक्ष की प्राप्ति

न्याय के अनुसार, अज्ञान ही बन्धन है और ज्ञान ही मुक्ति


न्याय दर्शन के 16 पदार्थ (षोडश पदार्थ)

न्याय दर्शन की सबसे विशिष्ट विशेषता इसके 16 पदार्थ हैं, जिनके ज्ञान से मोक्ष संभव माना गया है:

  1. प्रमाण (Means of Knowledge)
  2. प्रमेय (Objects of Knowledge)
  3. संशय
  4. प्रयोजन
  5. दृष्टान्त
  6. सिद्धान्त
  7. अवयव
  8. तर्क
  9. निर्णय
  10. वाद
  11. जल्प
  12. वितण्डा
  13. हेत्वाभास
  14. छल
  15. जाति
  16. निग्रहस्थान

न्याय दर्शन में प्रमाण (Pramāṇa)

न्याय दर्शन चार प्रमाण स्वीकार करता है:

1. प्रत्यक्ष प्रमाण

इन्द्रिय और मन के प्रत्यक्ष संपर्क से प्राप्त ज्ञान प्रत्यक्ष है।

2. अनुमान प्रमाण

व्याप्ति के आधार पर होने वाला ज्ञान अनुमान कहलाता है। उदाहरण: धुएँ से अग्नि का ज्ञान।

3. उपमान प्रमाण

सादृश्य के आधार पर होने वाला ज्ञान।

4. शब्द प्रमाण

आप्त पुरुष (वेद, ऋषि) के वचनों से प्राप्त ज्ञान।

न्याय दर्शन में वेद को आप्त वाक्य माना गया है।


अनुमान और पंचावयव न्याय

न्याय दर्शन का अद्वितीय योगदान है पंचावयव अनुमान:

  1. प्रतिज्ञा
  2. हेतु
  3. उदाहरण
  4. उपनय
  5. निगमन

यह प्रणाली आधुनिक लॉजिक से भी अधिक संरचित मानी जाती है।


प्रमेय : आत्मा, ईश्वर और जगत

न्याय दर्शन जिन प्रमेयों को स्वीकार करता है, उनमें प्रमुख हैं:

आत्मा

आत्मा नित्य, चेतन और कर्मफल का भोक्ता है।

ईश्वर

न्याय दर्शन ईश्वर को जगत का निमित्त कारण मानता है। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और करुणामय है।

जगत

जगत यथार्थ है, मिथ्या नहीं। यह न्याय को वेदान्त से अलग करता है।


दुःख और मोक्ष की अवधारणा

न्याय दर्शन के अनुसार संसार दुःखमय है। अविद्या, राग, द्वेष और कर्म दुःख के कारण हैं।

मोक्ष क्या है?

न्याय दर्शन में मोक्ष का अर्थ है:

  • दुःखों का पूर्ण अभाव
  • पुनर्जन्म का अंत
  • आत्मा का शुद्ध स्वरूप में स्थित होना

न्याय दर्शन और वेदान्त का तुलनात्मक अध्ययन

विषयन्याय दर्शनवेदान्त
जगतसत्यमिथ्या
ईश्वरकर्ताब्रह्म
मार्गतर्क + प्रमाणज्ञान

न्याय दर्शन और आधुनिक विज्ञान

न्याय दर्शन की तर्क-पद्धति आधुनिक विज्ञान, गणित और लॉजिक की आधारभूमि है। वैज्ञानिक पद्धति में प्रयुक्त hypothesis, observation और inference न्याय दर्शन से मेल खाते हैं।


आधुनिक जीवन में न्याय दर्शन की प्रासंगिकता

  • फेक न्यूज़ से बचाव
  • तार्किक निर्णय क्षमता
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण
  • आध्यात्मिक विवेक

FAQ : न्याय दर्शन

Q. क्या न्याय दर्शन नास्तिक है?
नहीं, न्याय दर्शन स्पष्ट रूप से ईश्वरवादी है।

Q. क्या न्याय दर्शन केवल वाद-विवाद के लिए है?
नहीं, इसका अंतिम लक्ष्य मोक्ष है।


निष्कर्ष : न्याय दर्शन का शाश्वत संदेश

न्याय दर्शन सिखाता है कि सत्य तक पहुँचने के लिए श्रद्धा के साथ-साथ तर्क भी आवश्यक है। यह दर्शन अंधविश्वास और नास्तिकता—दोनों के बीच संतुलित मार्ग प्रदान करता है।

न्याय दर्शन भारतीय बौद्धिक परम्परा का वह दीपक है, जिसने मानव बुद्धि को सत्य के पथ पर आलोकित किया।



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