पूर्व मीमांसा दर्शन : कर्म, धर्म और वेदप्रामाण्य का दार्शनिक विवेचन (Pūrva Mīmāṃsā Darśana)
प्रस्तावना : पूर्व मीमांसा दर्शन का स्थान
पूर्व मीमांसा दर्शन भारतीय दर्शन की वह शाखा है जो वेदों के कर्मकाण्ड का तर्कसंगत और शास्त्रीय विवेचन करती है। जहाँ वेदान्त उपनिषदिक ज्ञान पर केन्द्रित है, वहीं पूर्व मीमांसा यज्ञ, कर्म और धर्म को जीवन का आधार मानती है।
इस दर्शन के प्रवर्तक महर्षि जैमिनि हैं और इसका मूल ग्रंथ मीमांसा सूत्र है।
मीमांसा शब्द का अर्थ
‘मीमांसा’ का अर्थ है —
- गहन जाँच
- तर्कपूर्ण विवेचन
- शास्त्रार्थ
पूर्व मीमांसा का उद्देश्य है: वेदवाक्यों के वास्तविक अर्थ का निर्धारण।
वेदप्रामाण्य सिद्धांत
पूर्व मीमांसा का केन्द्रीय सिद्धांत है:
वेद अपौरुषेय हैं
- वेद किसी मनुष्य द्वारा रचित नहीं
- वेद स्वतः प्रमाण हैं
- वेदों में त्रुटि नहीं
इसलिए वेद ही धर्म के सर्वोच्च प्रमाण हैं।
धर्म की अवधारणा
पूर्व मीमांसा में धर्म का अर्थ:
- ईश्वर-भक्ति नहीं
- नैतिक भावना नहीं
- बल्कि विहित कर्मों का अनुष्ठान
चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः — जैमिनि
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कर्म सिद्धांत
पूर्व मीमांसा का मूल आधार कर्म है:
- यज्ञ
- होम
- दान
- व्रत
कर्म करने से अपूर्व उत्पन्न होता है, जो फल प्रदान करता है।
अपूर्व सिद्धांत
‘अपूर्व’ एक अदृश्य शक्ति है:
- जो कर्म और फल के बीच सेतु है
- कर्म के बाद उत्पन्न होती है
- भविष्य में फल देती है
यह सिद्धांत कर्मफल को तर्कसंगत बनाता है।
आत्मा की अवधारणा
पूर्व मीमांसा में आत्मा:
- नित्य है
- कर्ता है
- कर्मफल का भोक्ता है
मोक्ष की अपेक्षा स्वर्ग प्रमुख लक्ष्य है।
ईश्वर की भूमिका
पूर्व मीमांसा में:
- ईश्वर की अनिवार्यता नहीं
- वेद स्वयं पर्याप्त हैं
- कर्मफल स्वचालित नियम से मिलता है
यह दर्शन ईश्वरनिरपेक्ष कर्मवाद प्रस्तुत करता है।
भाषा और अर्थ मीमांसा
पूर्व मीमांसा ने:
- शब्द-प्रमाण
- वाक्य-शक्ति
- लक्षणा और व्यंजना
पर गहन विचार किया। आधुनिक भाषाविज्ञान इससे प्रभावित है।
मीमांसा के प्रमुख आचार्य
- जैमिनि
- शबरस्वामी
- कुमारिल भट्ट
- प्रभाकर
कुमारिल और प्रभाकर मत प्रसिद्ध हैं।
पूर्व मीमांसा और वेदान्त का संबंध
| विषय | पूर्व मीमांसा | वेदान्त |
|---|---|---|
| केंद्र | कर्म | ज्ञान |
| ग्रंथ | कर्मकाण्ड | उपनिषद |
| लक्ष्य | स्वर्ग | मोक्ष |
दोनों परस्पर पूरक हैं।
आधुनिक जीवन में पूर्व मीमांसा
- कर्तव्यबोध
- अनुशासन
- सामाजिक उत्तरदायित्व
- कर्मयोग की प्रेरणा
FAQ : पूर्व मीमांसा दर्शन
Q. क्या पूर्व मीमांसा नास्तिक है?
नहीं, यह ईश्वर को अनावश्यक मानती है, अस्वीकार नहीं।
Q. क्या केवल यज्ञ ही कर्म हैं?
नहीं, सभी वेदविहित कर्तव्य कर्म हैं।
निष्कर्ष : पूर्व मीमांसा का शाश्वत संदेश
पूर्व मीमांसा दर्शन सिखाता है कि कर्तव्य पालन ही धर्म है। यह दर्शन मानव को कर्म के प्रति उत्तरदायी बनाता है और बताता है कि जीवन का प्रत्येक कार्य अर्थपूर्ण है।
पूर्व मीमांसा के बिना वेदान्त अपूर्ण है—क्योंकि कर्म शुद्धि के बिना ज्ञान स्थिर नहीं होता।

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