जाबालि आश्रम: जहाँ प्रकृति और परमात्मा का मिलन होता है (कादम्बरी पृ. 39)



kadambari
शिष्यपुष्पमृद्गिरष्ययनमुखरैः सर्वतः प्रविक्तसौधमिव... अध्ययनमुखरबटुजनमनवरतश्रवणगृहीतवषट्कारवाचालशुककुलमनेकसारिकोदीर्यमाणसुब्रह्मण्यमरण्यकपोतैस्तुल्यमानशुकबलिपिण्डमासन्नवापीकलहंसपोतमुच्यमाननीवारबलिपुष्पोपचीयमानमुनिबालकमभिकायार्धदग्धसिमिसिमायमानसमिदाहुतिकुसुममुपलप्रहतनालिकेररसदिग्धशिलातलमविरतक्षुण्णवल्कलरसपाटलभूवलं रक्तचन्दनोपासनादिमण्डलाङ्कितकरवीरकुसुममितस्ततो विक्षेपिभिर्भस्मरेखाकृतमुनिजनभोजनभूमिपरिहारं परिचितशाखामृगकराकृष्टिनिष्कास्यमानप्रवेश्यमानजगद्वन्द्यतापसमिमकलशौचोपमुक्तपतितैः सरस्वतीभुजलताविगलितैः शङ्खवलयैरिव मृणालशकलैः क्वापि वनकरिभिरापूर्यमाणविटपाठवालकमृषिकुमारकाकृष्यमाणवनवराहदन्तलग्नामिः उपजातपरिचयैः कलापिभिः...।
पद-विवरणम् एवं व्याकरण-विशेषः: १. अध्ययनमुखरबटुजनम्: - अध्ययनेन मुखराः (शब्दायमानाः) बटवः (ब्रह्मचारिणः) यत्र तत् । तपोवने वेदाध्ययनस्य ध्वनिः सर्वत्र व्याप्तः आसीत् । २. वषट्कारवाचालशुककुलम्: - वषट्कारः (यज्ञमन्त्रान्त-विशेषः), तेन वाचालाः (बोलने वाले) शुकाः (तोते) । ऋषीणां मन्त्रान् श्रुत्वा तोता अपि मन्त्रोच्चारणं कुर्वन्ति स्म । ३. सिमिसिमायमान: - अग्न्याहुतौ समिधां पतनेन यो ध्वनिः उत्पद्यते, सः 'सिमिसिम' इति । अत्र अनुकरणशब्दस्य प्रयोगः (Onomatopoeia) । ४. वल्कलरसपाटलभूवलम्: - वल्कलक्षालनेन निर्गतः यः रसः, तेन पाटला (श्वेत-रक्ता) भूवलम् (भूमिः) । ५. परिचितशाखामृग: - शाखामृगः अर्थात् वानरः । आश्रमस्य वानराः अपि मुनिभिः सह परिचिताः आसन् । शास्त्रीय-टिप्पणी: अत्र 'स्वभावोक्ति' अलङ्कारस्य अनुपमं निदर्शनं वर्तते । बाणभट्टेनात्र तपोवनस्य आचार-व्यवहार-पशु-पक्षिणां च सूक्ष्मवर्णनं कृतम् । मृणालशकलैः (कमल-नाल-खण्डैः) सह 'सरस्वती-वलय' इत्युत्प्रेक्षा अतीव रमणीया वर्तते ।
जाबालि ऋषि का आश्रम ज्ञान और तपस्या का साक्षात् केंद्र था। वहाँ चारों ओर ब्रह्मचारी शिष्य वेदाध्ययन के सस्वर पाठ से वातावरण को गुंजायमान कर रहे थे। आश्चर्य तो यह था कि आश्रम के तोते और मैना भी निरंतर वेद-मन्त्रों और 'वषट्कार' को सुन-सुनकर वैसा ही उच्चारण कर रहे थे।

यज्ञ की वेदियों में आहुति दी जा रही थी, जिससे समिधाओं के जलने की 'सिमिसिम' ध्वनि हो रही थी। पत्थरों के तल पर ऋषियों द्वारा फोड़े गए नारियल का रस फैला हुआ था और भूमि वल्कल वस्त्रों के धोने से निकले लाल रंग से रंजित थी। आश्रम के वानर और मृग मुनियों के साथ इतने घुल-मिल गए थे कि वे बिना किसी भय के ऋषियों के समीप क्रीड़ा करते थे। कमलिनी के श्वेत मृणाल (डंठल) के टुकड़े ऐसे लग रहे थे मानो साक्षात् सरस्वती माता की भुजाओं से गिरे हुए शंख के कंगन हों। यहाँ की वायु भी मन्त्रों के प्रभाव से पवित्र हो गई थी।
The hermitage of Sage Jabali was an epitome of divine discipline and natural harmony. The air vibrated with the continuous chanting of Vedic hymns by the young celibates (Brahmacharis). Even the parrots and starlings of the grove had learned to repeat the sacred syllables of the 'Vashatkara' sacrifices.

Sacrificial fires crackled softly as offerings were made, emitting a distinct rhythmic sound. The ground was stained pale-red by the juices of washed bark-garments, and stones were wet with the nectar of coconuts broken for rituals. The wild monkeys and deer lived in such profound peace with the monks that they knew no fear. The white fragments of lotus stalks scattered about appeared like the conch-shell bangles slipped from the arms of Goddess Saraswati herself. This was a sanctuary where spirituality met nature in its purest form.

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अथर्ववेदः/काण्डं १/सूक्तम् २७