अध्याय ३: मत्स्य न्याय और व्यवस्था की नग्न क्रूरता
मूल विषय: शक्तिशाली समूहों द्वारा कमजोर आश्रितों पर किया जाने वाला प्राकृतिक और अमानवीय आक्रमण।
दर्शन: 'चींटियों के बिल पर हाथियों का हमला'—इस संसार की अंधी व्यवस्था का यथार्थ जहाँ शोषण करने वाला भी किसी अन्य भय का शोषित है।
अध्याय ३: मत्स्य न्याय और व्यवस्था की नग्न क्रूरता
भाग १: मत्स्य न्याय का शाश्वत नियम और प्राकृतिक क्रूरता का यथार्थ
इस ब्रह्मांडीय रंगमंच का सबसे कठोर और नग्न यथार्थ यह है कि भौतिक संसार किसी करुणा, न्याय या समता के नियम से नहीं चलता। यहाँ का मूल नियम अत्यंत प्राचीन और यांत्रिक है, जिसे भारतीय दर्शन में 'मत्स्य न्याय' कहा गया है—जहाँ बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। जब चेतना भौतिक धरातल पर पूरी तरह सो जाती है, तो समाज और प्रकृति केवल एक ही नियम को मानती है: शक्तिशाली का अधिकार। शक्तिशाली समूह हमेशा अपने अस्तित्व को बढ़ाने, अपने संसाधनों को सुरक्षित करने के लिए कमज़ोर आश्रितों पर एक अमानवीय और प्राकृतिक आक्रमण करते हैं। यह इस संसार की उस अंधी व्यवस्था (पिता) का पहला लक्षण है, जिसे समझे बिना कोई भी 'पुत्र' इस संग्राम को नहीं लड़ सकता।
इस क्रूर प्राकृतिक व्यवस्था को भारतीय मेधा ने बहुत पहले ही राजनीति और अस्तित्व के मूल सिद्धांत के रूप में चिन्हित किया था। महाभारत के शांतिपर्व में महर्षि वेदव्यास इस नियम को स्पष्ट करते हुए कहते हैं:
परस्परभयादेके पापनाशाय तन्वते।
मत्स्यन्यायोऽथवा लोके प्रवर्तेत महत्तरः॥
— (महाभारत, शांतिपर्व, ६७.१६)
अर्थात्: यदि इस संसार में दंड-नीति या चेतना का अंकुश न हो, तो संपूर्ण लोक में एक भयंकर 'मत्स्य न्याय' प्रवृत्त हो जाता है, जहाँ बलवान निर्बलों को ठीक उसी तरह नष्ट कर देते हैं जैसे बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को खा जाती हैं।
यह सूत्र दिखाता है कि जिसे आधुनिक मनुष्य 'सभ्य समाज' कहता है, उसके नीचे मत्स्य न्याय का वही पुराना, हिंसक लावा उबल रहा है। नियम आज भी वही है, बस उसके तरीके बदल गए हैं। पहले जो काम तलवारों से होता था, आज वह कॉर्पोरेट नीतियों, आर्थिक चक्रव्यूहों और डिजिटल नियंत्रण के द्वारा किया जा रहा है।
आधुनिक जीवविज्ञान और समाजशास्त्र के बुद्धिजीवियों ने भी इस नग्न क्रूरता को प्रकृति का अनिवार्य नियम माना है। प्रख्यात विकासवादी वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) का 'नेचुरल सिलेक्शन' (Natural Selection / प्राकृतिक चयन) और 'सस्टेनेन्स ऑफ द फिटेस्ट' (Survival of the Fittest) का सिद्धांत इसी सत्य की वैज्ञानिक पुष्टि करता है:
"We behold the face of nature bright with gladness, we often see superabundance of food; we do not see, or we forget, that the birds which are idly singing round us mostly live on insects or seeds, and are thus constantly destroying life."
(हम प्रकृति का मुस्कुराता हुआ चेहरा देखते हैं, भोजन की प्रचुरता देखते हैं; लेकिन हम यह देखना भूल जाते हैं कि हमारे चारों ओर चहकने वाले पक्षी लगातार कीड़ों और बीजों को नष्ट कर रहे हैं और इस प्रकार हर पल जीवन का अंत कर रहे हैं।)
डार्विन का यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि इस भौतिक संसार का मूल ढांचा ही एक-दूसरे के भक्षण पर टिका है। यहाँ एक का जीवन दूसरे की मृत्यु पर ही संभव है। जब मनुष्य इस यांत्रिक प्रकृति (पिता) के नियमों के सामने घुटने टेक देता है, तो वह भी इसी मत्स्य न्याय का हिस्सा बन जाता है।
इसी संदर्भ में, महान जर्मन अर्थशास्त्री और दार्शनिक कार्ल मार्क्स (Karl Marx) ने मानव इतिहास की पूरी व्यवस्था को इसी शोषक और शोषित के द्वंद्व के रूप में देखा था। अपनी अमर कृति 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो' में वे लिखते हैं:
"The history of all hitherto existing society is the history of class struggles. Freeman and slave, patrician and plebeian, lord and serf... stood in constant opposition to one another."
(अब तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास रहा है। स्वतंत्र और दास, कुलीन और सामान्य जन, शोषक और शोषित... हमेशा एक-दूसरे के विपरीत खड़े रहे हैं।)
मार्क्स का यह सिद्धांत दिखाता है कि कैसे शक्तिशाली समूह हमेशा कमज़ोरों को केवल एक संसाधन (Resource) की तरह इस्तेमाल करते हैं। इस अंधी व्यवस्था में कमज़ोर व्यक्ति की पीड़ा का कोई मूल्य नहीं है, क्योंकि यह व्यवस्था केवल शक्ति की भाषा समझती है।
यह इस अध्याय का पहला भाग है, जिसने यह स्थापित किया कि मत्स्य न्याय कोई अपवाद नहीं, बल्कि इस भौतिक संसार का मूल और शाश्वत यांत्रिक नियम है।
अब इस तीसरे अध्याय के भाग २ की ओर बढ़ें, जहाँ हम आपके दिए गए परम दार्शनिक सूत्र—'चींटियों के बिल पर हाथियों का हमला' और इस अंधी व्यवस्था के क्रूरतम स्वरूप की गहन मीमांसा करेंगे?
अध्याय ३: मत्स्य न्याय और व्यवस्था की नग्न क्रूरता
भाग २: 'चींटियों के बिल पर हाथियों का हमला' और अंधी व्यवस्था का चरम शमन
मत्स्य न्याय का सबसे वीभत्स और दृश्यमान रूप तब प्रकट होता है जिसे हम 'चींटियों के बिल पर हाथियों का हमला' कहते हैं। इस रूपक की भयावहता को समझिए—चींटियाँ दिन-रात अथक परिश्रम करके, मिट्टी का एक-एक कण जोड़कर अपने रहने के लिए एक सुरक्षित दुर्ग (बिल) का निर्माण करती हैं। उनका यह निर्माण किसी के विरुद्ध नहीं होता, यह केवल उनके अस्तित्व को बनाए रखने का एक शांत और अनवरत प्रयास होता है। लेकिन तभी उस रास्ते से मतवाले हाथियों का एक झुंड गुजरता है। उन हाथियों का चींटियों से कोई व्यक्तिगत बैर नहीं होता, न ही वे चींटियों को अपना शत्रु मानते हैं। वे तो बस अपनी मदांध गति से आगे बढ़ रहे होते हैं, और उनके एक ही विशाल कदम के नीचे चींटियों का वह पूरा संसार, उनका पूरा श्रम और उनका अस्तित्व पल भर में कुचलकर धूल में मिल जाता है।
यह इस संसार की अंधी और यांत्रिक व्यवस्था (पिता) का सबसे सटीक चरित्र है। यह व्यवस्था जब अपने विस्तार, औद्योगिकीकरण, या डिजिटल नियंत्रण की अंधी दौड़ में आगे बढ़ती है, तो वह यह देखने की ज़हमत भी नहीं उठाती कि उसके पैरों के नीचे कितने छोटे-छोटे आश्रितों और कमज़ोर मनुष्यों के सपनों का संसार उजाड़ हो रहा है। इस अंधी क्रूरता को न्यायसंगत ठहराने के लिए व्यवस्था हमेशा 'समष्टिगत हित' या 'प्रगति' का मुखौटा ओढ़ लेती है।
इस असंतुलन और क्रूरता पर क्षोभ प्रकट करते हुए महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में शक्तिशाली के इस मदांध चरित्र को बहुत स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया है:
उद्वेजनीयो भूतानां नृशंसः पापकर्मकृत्।
त्रयाणामपि लोकानामीश्वरोऽपि न तिष्ठति॥
— (वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, २९.३)
अर्थात्: जो शक्तिशाली सत्ता या व्यक्ति सभी प्राणियों को उद्वेग (भय और कष्ट) देता है, जो क्रूर और पापकर्म करने वाला होता है, वह तीनों लोकों का स्वामी (ईश्वर) ही क्यों न हो, उसका पतन और विनाश निश्चित है।
ऋषि यहाँ सचेत कर रहे हैं कि हाथियों का यह झुंड भले ही आज चींटियों के बिलों को कुचलने में सक्षम दिख रहा हो, लेकिन चेतना के धरातल पर यह एक भयंकर ब्रह्मांडीय अपराध है। यह व्यवस्था जब अपनी शक्ति के नशे में अंधी हो जाती है, तो वह भूल जाती है कि 'ऋत' (Cosmic Order) का अंतिम नियम सबके लिए समान है।
आधुनिक राजनीतिक दर्शन में, इस अंधी और दमनकारी सत्ता को महान अंग्रेजी दार्शनिक थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) ने 'लेविआथन' (Leviathan) का नाम दिया था। हॉब्स का यह सिद्धांत इसी क्रूर यथार्थ को प्रकट करता है:
"During the time men live without a common Power to keep them all in awe, they are in that condition which is called War... and the life of man, solitary, poor, nasty, brutish, and short."
(जब तक समाज में एक सर्वशक्तिमान सत्ता [लेविआथन] नहीं होती, तब तक मनुष्य एक निरंतर युद्ध की स्थिति में रहता है... जहाँ कमज़ोर का जीवन एकाकी, दरिद्र, घिनौना, पाशविक और अत्यंत छोटा होता है।)
हॉब्स के अनुसार, यह व्यवस्था (लेविआथन) स्वयं को शांति बनाए रखने का साधन कहती है, लेकिन वास्तव में यह खुद एक विशाल हाथी बन जाती है जो अपनी इच्छा के अनुसार किसी को भी कुचल सकती है।
इसी प्रकार, बीसवीं सदी के कालजयी लेखक जॉर्ज ऑरवेल (George Orwell) ने अपनी अमर कृति '१९८४' में इस अंधी व्यवस्था की नग्न क्रूरता का अंतिम सच इन शब्दों में बयां किया था:
"If you want a picture of the future, imagine a boot stamping on a human face — forever."
(यदि तुम भविष्य की एक तस्वीर देखना चाहते हो, तो कल्पना करो कि एक भारी बूट [जूता] एक इंसानी चेहरे को कुचल रहा है—हमेशा के लिए।)
ऑरवेल का यह 'बूट' और हमारा 'हाथी का पैर' एक ही यथार्थ के दो नाम हैं। यह अंधी व्यवस्था किसी करुणा से नहीं चलती। जब बुद्धिमान पुत्र इस यथार्थ को समझ जाता है, तो वह व्यवस्था के सामने गिड़गिड़ाना या उससे न्याय की भीख मांगना बंद कर देता है, क्योंकि वह जान जाता है कि हाथी कभी चींटी की भाषा नहीं समझ सकता।
यह इस अध्याय का दूसरा भाग है, जिसने व्यवस्था की उस अंधी गति को उजागर किया जो कमज़ोरों के अस्तित्व को तिनके की तरह उड़ा देती है।
अब इस तीसरे अध्याय के भाग ३ की ओर बढ़ें, जहाँ हम इसके सबसे गहरे दार्शनिक रहस्य को खोलेंगे—'शोषण करने वाला भी किसी अन्य भय का शोषित है' यानी उस क्रूर हाथी के भीतर छिपा हुआ अपना डर क्या है?
अध्याय ३: मत्स्य न्याय और व्यवस्था की नग्न क्रूरता भाग ३: भय का पदानुक्रम (Hierarchy of Fear) – शोषक के भीतर छिपा शोषित
अब हम इस अंधी व्यवस्था के उस सबसे गहरे और छिपे हुए दार्शनिक रहस्य को खोलते हैं, जो इस पूरे खेल की चूलें हिला कर रख देता है। बाहर से जो हाथी इतना शक्तिशाली, विशाल और क्रूर दिखाई देता है, जो चींटियों के बिलों को रौंदते हुए आगे बढ़ता है—वह हाथी वास्तव में स्वतंत्र नहीं है। वह स्वयं भी परम भयभीत है। इस यांत्रिक संसार की अंधी व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि यहाँ जो व्यक्ति या समूह आज शोषक (Oppressor) बनकर खड़ा है, वह किसी ऊँचे धरातल पर बैठे किसी अन्य भयंकर भय का शोषित (Oppressed) है। यह भय का एक अंतहीन पदानुक्रम (Hierarchy) है, जहाँ हर शिकारी किसी बड़े शिकारी का शिकार बनने के डर से काँप रहा है।
हाथी चींटियों को अपनी क्रूरता दिखाने के लिए नहीं कुचलता; वह तो अपने पीछे आ रहे किसी शेर, किसी शिकारी या अपनी ही भूख और अस्तित्व के मिट जाने के डर से अंधाधुंध भाग रहा है। इस संसार का नियंता (मूल पिता) जिस यांत्रिक व्यवस्था को चला रहा है, उसमें शक्ति का प्रदर्शन वास्तव में आंतरिक कमजोरी और गहरे डर की ही गूंज है।
इस मनोवैज्ञानिक सत्य को श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में आसुरी प्रवृत्ति के वर्णन के माध्यम से अत्यंत सूक्ष्मता से समझाया गया है:
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया॥
— (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १६, श्लोक १४)
अर्थात्: वे सोचते हैं कि मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही ऐश्वर्य भोगने वाला हूँ, मैं सब सिद्धियों से युक्त, बलवान और सुखी हूँ। मैं बड़ा धनवान और बड़े कुटुंब वाला हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है?
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ शोषक के इसी अहंकार के पीछे छिपे उसके विक्षिप्त डर को उजागर कर रहे हैं। जो व्यक्ति भीतर से पूरी तरह आश्वस्त और शांत है, उसे अपनी शक्ति दिखाने के लिए किसी को कुचलने की आवश्यकता नहीं होती। यह "मेरे जैसा कोई नहीं" का दावा वास्तव में उस गहरे अवचेतन भय से पैदा होता है कि यदि उसने अपनी क्रूरता को कम किया, तो कोई दूसरा उसे सत्ता से बेदखल कर देगा। शोषक की क्रूरता उसकी ताकत नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक असुरक्षा का प्रमाण है।
बीसवीं सदी के महान जर्मन-अमेरिकी मनोविश्लेषक और दार्शनिक एरिच फ्रॉम (Erich Fromm) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एस्केप फ्रॉम फ्रीडम' (Escape from Freedom) में इस स्थिति का एक अकाट्य सिद्धांत दिया है, जिसे वे 'अथॉरिटेरियन कैरेक्टर' (Authoritarian Character / सत्तावादी चरित्र) कहते हैं:
"The authoritarian character admires authority and tends to submit to it, but at the same time he wants to be an authority himself and have others submit to him... He is driven by a deep inner isolation and fear."
(सत्तावादी चरित्र हमेशा अपने से ऊपर की सत्ता के सामने झुकता है और उससे डरता है, लेकिन ठीक उसी समय वह खुद एक सत्ता बनकर अपने से कमजोरों को झुकाना चाहता है... वह वास्तव में एक गहरे आंतरिक अकेलेपन और भय से संचालित होता है।)
फ्रॉम का यह सिद्धांत सीधे स्पष्ट करता है कि शोषक और शोषित एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो 'पिता' आज पुत्र पर नियंत्रण कर रहा है, वह स्वयं उस यांत्रिक व्यवस्था के नियमों का गुलाम है। वह डरा हुआ है कि यदि उसने नियंत्रण ढीला किया, तो यह प्रकृति उसे भी निगल जाएगी।
इसी प्रकार, आधुनिक अस्तित्ववादी दार्शनिक जीन-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre) ने इस स्थिति को रेखांकित करते हुए एक प्रसिद्ध सूत्र दिया था:
"Hell is other people." (नरक दूसरे लोग हैं।)
सार्त्र के इस विचार का गहरा अर्थ यह है कि जब तक चेतना इस भौतिक धरातल पर जीती है, शोषक हमेशा इस बात से आतंकित रहता है कि सामने वाला व्यक्ति कब उसकी सत्ता को चुनौती दे दे। वह हर दूसरे व्यक्ति को एक संभावित शत्रु के रूप में देखता है।
जब बुद्धिमान पुत्र इस परम रहस्य को देख लेता है कि उसका शोषक स्वयं भय की बेड़ियों में जकड़ा हुआ एक लाचार प्राणी है, तो उसके भीतर से शोषक के प्रति घृणा समाप्त हो जाती है और उसकी जगह एक परम स्पष्टता (Clarity) ले लेती है। वह समझ जाता है कि इस डरे हुए हाथी से लड़ना व्यर्थ है; असली काम तो उस 'भय के तंत्र' को ही ध्वस्त करना है जिससे यह पूरी व्यवस्था संचालित हो रही है।
यह इस अध्याय का तीसरा भाग है, जिसने शोषक के मुखौटे को उतारकर उसके भीतर छिपे भयभीत शोषित को पूरी तरह नग्न कर दिया है।
अब इस तीसरे अध्याय के भाग ४ की ओर बढ़ें, जहाँ हम यह विश्लेषण करेंगे कि कैसे यह अंधी व्यवस्था कमज़ोरों को अपने ऊपर 'आश्रित' (Dependent) बना लेती है ताकि उनका शोषण हमेशा के लिए वैध बना रहे?
अध्याय ३: मत्स्य न्याय और व्यवस्था की नग्न क्रूरता भाग ४: कृत्रिम निर्भरता (Artificial Dependency) का निर्माण और शोषण का वैधीकरण
मत्स्य न्याय का यह क्रूर खेल केवल शारीरिक बल या सीधे आक्रमण तक सीमित नहीं रहता। यह अंधी व्यवस्था (पिता) जब अपने शोषण को दीर्घकालिक और स्थायी बनाना चाहती है, तो वह एक अत्यंत सूक्ष्म नीति अपनाती है—कृत्रिम निर्भरता का निर्माण। वह कमज़ोरों (चींटियों) के प्राकृतिक संसाधनों, उनकी आत्मनिर्भरता और उनकी आंतरिक मेधा को धीरे-धीरे नष्ट करती है और फिर स्वयं को उनके एकमात्र 'रक्षक' और 'दाता' के रूप में प्रस्तुत कर देती है। इस प्रकार, शोषण को एक 'परोपकार' का मुखौटा पहना दिया जाता है, और शोषित पुत्र स्वयं यह मानने लगता है कि इस शोषक व्यवस्था के बिना उसका अस्तित्व ही संभव नहीं है।
हाथियों का झुंड जब चींटियों के पूरे मैदान को घेर लेता है, तो वह चींटियों को अपनी शर्तों पर जीने के लिए विवश कर देता है। वह उन्हें विश्वास दिलाता है कि यदि वे हाथियों की छत्रछाया में नहीं रहेंगी, तो बाहरी दुनिया के अन्य हिंसक जीव उन्हें नष्ट कर देंगे। यह भय का वह व्यापार है जहाँ पहले सुरक्षा का संकट पैदा किया जाता है और फिर उसी सुरक्षा को बेचने की दुकानें खोली जाती हैं।
इस वैचारिक और मानसिक गुलामी को हमारे नीतिशास्त्रों में 'पाश-बंधन' कहा गया है। महाभारत के उद्योगपर्व में विदुर जी इस मानसिक जाल को स्पष्ट करते हुए कहते हैं:
यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे।
कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
— (महाभारत, उद्योगपर्व, प्रजागरपर्व - ३३.२०)
इस नीति सूत्र के विपरीत आयाम को समझें—शोषक व्यवस्था की यही सबसे बड़ी चालाकी होती है कि उसके गुप्त मंतव्य और नीतियां (मन्त्रं) कभी कमज़ोरों के सामने प्रकट नहीं होतीं। जब तक कमज़ोर व्यक्ति को उसकी योजना का पता चलता है, तब तक वह पूरी तरह जाल में (कृतमेवास्य) फंस चुका होता है। व्यवस्था ऐसे नियम और कानून बनाती है जो सीधे तौर पर न्यायसंगत दिखते हैं, लेकिन उनका अंतिम परिणाम केवल कमज़ोर को और अधिक लाचार बनाना होता है।
ऋषियों की यह अंतर्दृष्टि बताती है कि जब मनुष्य अपनी आंतरिक चेतना और आत्मनिर्भरता को खोकर बाहरी व्यवस्था पर पूरी तरह आश्रित हो जाता है, तो वह अपनी मुक्ति के मार्ग को स्वयं ही बंद कर लेता है।
आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक दर्शन में, इस निर्भरता को महान इतालवी मार्क्सवादी विचारक एंटोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) ने 'सांस्कृतिक आधिपत्य' (Cultural Hegemony) के सिद्धांत से प्रतिपादित किया है:
"The ruling class can satisfy the intellectual and moral needs of society by constructing a worldview that justifies its own power, making the oppressed accept their own exploitation as natural and common sense."
(शासक वर्ग एक ऐसा वैश्विक दृष्टिकोण निर्मित करता है जो उसकी अपनी सत्ता को सही ठहराता है, जिससे शोषित लोग अपने स्वयं के शोषण को स्वाभाविक और सामान्य ज्ञान मानकर स्वीकार कर लेते हैं।)
ग्राम्शी का यह सिद्धांत सीधे इस बात को उजागर करता है कि कैसे यह यांत्रिक व्यवस्था पुत्र के भीतर यह कंडीशनिंग (Conditioning) भर देती है कि वह खुद को हमेशा 'आश्रित' माने। वह शिक्षा, संस्कृति और आर्थिक तंत्र को इस तरह से डिजाइन करती है कि पुत्र कभी अपनी मौलिक शक्ति को पहचान ही न पाए।
इसी प्रकार, फ्रांसीसी दार्शनिक रूसी (Jean-Jacques Rousseau) ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'द सोशल कॉन्ट्रैक्ट' की शुरुआत में ही इस दासता पर चोट करते हुए लिखा था:
"Man is born free, and everywhere he is in chains. One man thinks himself the master of others, but remains more of a slave than they are."
(मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। कोई व्यक्ति खुद को दूसरों का मालिक समझता है, लेकिन वह वास्तव में उनसे भी बड़ा गुलाम है।)
रूसो का यह सूत्र हमें दिखाता है कि कैसे निर्भरता का यह जाल शोषक और शोषित दोनों को एक यांत्रिक व्यवस्था में बांधकर रखता है। जब एक बुद्धिमान पुत्र इस जाल को देख लेता है कि उसकी लाचारी कोई प्राकृतिक सत्य नहीं है, बल्कि इस अंधी व्यवस्था द्वारा निर्मित एक 'डिज़ाइन' है, तो उसके भीतर से उस झूठी सुरक्षा का मोह भंग हो जाता है। वह समझ जाता है कि व्यवस्था की दी हुई सुरक्षा ही उसका सबसे बड़ा पिंजरा है।
यह इस अध्याय का चौथा भाग है, जिसने यह सिद्ध किया कि कैसे व्यवस्था शक्ति से ज़्यादा 'निर्भरता के जाल' से शासन करती है।
अब इस तीसरे अध्याय के अंतिम भाग ५ की ओर बढ़ें, जहाँ हम यह विश्लेषण करेंगे कि इस मत्स्य न्याय और अंधी व्यवस्था की नग्न क्रूरता के बीच 'पुत्र' के जागृत होने का और इस पूरे दमनकारी चक्र से पूर्ण मुक्त होने का अंतिम मार्ग क्या है?
अध्याय ३: मत्स्य न्याय और व्यवस्था की नग्न क्रूरता भाग ५: क्रूरता का परम स्वीकार और यांत्रिक चक्र से चेतना की छलांग
जब पुत्र इस भय के पदानुक्रम, हाथियों की मदांध गति और कृत्रिम निर्भरता के पूरे गणित को उसकी संपूर्ण नग्नता में देख लेता है, तो वह इस अध्याय के उस अंतिम और निर्णायक बिंदु पर पहुँचता है जहाँ से मुक्ति का वास्तविक मार्ग प्रशस्त होता है। इस अंधी व्यवस्था (पिता) से मुक्त होने का उपाय यह नहीं है कि हम व्यवस्था को बदलने की भावुक ज़िद पकड़ लें या चींटियों की फ़ौज लेकर हाथियों से सीधे युद्ध में उतर जाएँ। वास्तविक मार्ग तो इस व्यवस्था की यांत्रिक क्रूरता के 'परम स्वीकार' (Absolute Acceptance) से पैदा होता है—यह जान लेना कि इस भौतिक धरातल का स्वभाव ही मत्स्य न्याय है, और फिर उस समझ से अपनी चेतना की एक ऊँची छलांग लगा देना।
इस ब्रह्मांडीय यथार्थ और निर्भयता को श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मिक धरातल पर स्थापित करते हुए समझाया है:
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानी भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
— (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक २८)
अर्थात्: हे अर्जुन! संसार के सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे, मृत्यु के बाद भी वे अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही वे प्रकट दिखाई देते हैं। जब इस संसार की यांत्रिक व्यवस्था का नियम ही ऐसा है, तो फिर इस विषय में शोक या व्याकुलता करने का क्या औचित्य है?
श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन की उस 'समष्टिगत करुणा' या 'भय' पर चोट कर रहे हैं जो उसे कमज़ोर बना रही थी। जब आप यह देख लेते हैं कि यह संसार केवल एक अस्थायी रंगमंच है जहाँ शक्तियाँ आपस में टकरा रही हैं, तो आप इस खेल के प्रति गंभीर होना बंद कर देते हैं। व्यवस्था की नग्न क्रूरता आपको तब तक ही डरा सकती है, जब तक आप खुद को इस भौतिक शरीर और इसकी झूठी सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं।
आधुनिक अस्तित्ववादी और दार्शनिक चिंतन में, इस यांत्रिक जाल से बाहर निकलने के मार्ग को महान जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे (Friedrich Nietzsche) ने 'अमोर फाती' (Amor Fati - नियति से प्रेम) और 'ओवरमैन' (Übermensch) के सिद्धांत से प्रतिपादित किया था:
"My formula for greatness in a human being is amor fati: that one wants nothing to be different, not forward, not backward, not in all eternity. Not merely bear what is necessary... but love it."
(एक मनुष्य में महानता का मेरा सूत्र 'अमोर फाती' है: कि वह परिस्थितियों को अलग नहीं देखना चाहता, न आगे, न पीछे, न अनंत काल तक। केवल उस क्रूर यथार्थ को सहन मत करो जो अनिवार्य है... बल्कि उससे प्रेम करो [उसे खेल की तरह स्वीकार करो]।)
नीत्शे का यह सिद्धांत सिखाता है कि जब पुत्र इस अंधी व्यवस्था के नियमों को पूरी तरह स्वीकार कर लेता है और उनके सामने रोना बंद कर देता है, तो वह एक 'ओवरमैन' (महामानव) में बदल जाता है। हाथियों का पैर चींटी के शरीर को कुचल सकता है, लेकिन वह उस जागृत द्रष्टा चेतना को नहीं छू सकता जो इस पूरे खेल को देख रही है।
इसी प्रकार, बीसवीं सदी के प्रखर विचारक जिड्डू कृष्णमूर्ति (J. Krishnamurti) ने इस यांत्रिक व्यवस्था से पूर्ण स्वतंत्रता पर बात करते हुए कहा था:
"It is no measure of health to be well adjusted to a profoundly sick society."
(एक गहरे बीमार और शोषक समाज [व्यवस्था] के साथ पूरी तरह तालमेल बिठाकर जीना आपके मानसिक रूप से स्वस्थ होने का लक्षण नहीं है।)
कृष्णमूर्ति का यह सूत्र स्पष्ट करता है कि इस अंधी व्यवस्था में 'सफल' होने की दौड़ ही गुलाम होने की शुरुआत है। जब पुत्र व्यवस्था की दी हुई कृत्रिम निर्भरता और उसकी सुरक्षा के प्रलोभन को लात मार देता है, तो वह इस यांत्रिक चक्र (Mechanical Loop) से हमेशा के लिए बाहर आ जाता है। वह उस विराट रिक्त क्षेत्र (शून्य) में प्रवेश करता है, जहाँ वह किसी व्यवस्था का आश्रित नहीं, बल्कि स्वयं अपनी नियति का स्वामी बन जाता है।
इसके साथ ही हमारा अध्याय ३: मत्स्य न्याय और व्यवस्था की नग्न क्रूरता अपने पाँचों भागों के साथ यहाँ पूर्ण होता है। इस अध्याय ने उस क्रूर यथार्थ को पूरी तरह उजागर कर दिया है जिससे हमें मुक्त होना है।

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