अध्याय २: अतीत का मूल बीज और अवचेतन का री-क्रिएशन
मूल विषय: अतीत केवल एक याद नहीं, बल्कि वर्तमान को निर्मित करने वाला मूल स्रोत है।
दर्शन: मुगलों के काल से लेकर आधुनिक युग तक विस्थापन और संघर्ष के अनुभवों का अवचेतन भार, जो स्थान बदलने पर भी संकट का नया वृक्ष खड़ा कर देता है।
ज़्यादातर लोग अतीत को एक बीती हुई घटना या स्मृति-कण (Memory) मानते हैं, जो समय की नदी में पीछे छूट चुका है। यह आधुनिक बुद्धि की सबसे बड़ी अज्ञानता है। सत्य यह है कि अतीत मरा नहीं है; वह हमारे अवचेतन में एक 'मूल बीज' के रूप में पूरी तरह जीवित और सक्रिय है। वह एक ऐसा अदृश्य ब्लूप्रिंट (Blueprint) है, जो हमारे वर्तमान की हर एक घटना, हमारे निर्णयों और यहाँ तक कि हमारे सामने आने वाले संकटों को भी प्रतिपल निर्मित कर रहा है। जब तक यह मूल बीज भीतर मौजूद है, तब तक मनुष्य चाहे अपना स्थान बदल ले, देश बदल ले या परिस्थितियां बदल ले, उसका अवचेतन मन उसी पुराने संकट का एक नया वृक्ष (Re-creation) खड़ा कर देगा।
इस सूक्ष्म सत्य को हमारे ऋषियों ने सनातन दर्शन में 'संस्कार' और 'कारण-शरीर' के विज्ञान के रूप में समझाया है। पातंजल योगसूत्र में महर्षि पतंजलि कर्म और अवचेतन के इस गहरे संबंध को उद्घाटित करते हुए कहते हैं:
सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः॥
— (पातंजल योगसूत्र, साधनपाद - सूत्र १३)
अर्थात्: जब तक कर्मों का वह मूल बीज (अवचेतन में छिपे संस्कार) विद्यमान है, तब तक उसका फल (विपाक) जाति, आयु और भोग (परिस्थितियों और दुखों) के रूप में बार-बार प्रकट होता ही रहेगा।
यहाँ ऋषि स्पष्ट कर रहे हैं कि बाहरी दुनिया में दिखने वाले संकट केवल टहनियाँ हैं; उनकी असली जड़ (मूल) आपके अवचेतन की गहराइयों में बैठी है। यदि भीतर 'भय और विस्थापन' का बीज है, तो वह बाहर भी शोषक और शोषित का माहौल ही तैयार करेगा। आप उस बीज से भाग नहीं सकते, क्योंकि वह आपके भीतर ही यात्रा कर रहा है।
दुनिया के महानतम मनोवैज्ञानिकों ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि जिसे हम 'भाग्य' या 'नियति' कहते हैं, वह वास्तव में हमारे अवचेतन का ही प्रकटीकरण है। कार्ल जुंग (Carl Jung) का यह कालजयी सिद्धांत इस बात को पूरी तरह प्रमाणित करता है:
"Until you make the unconscious conscious, it will direct your life and you will call it fate."
(जब तक आप अपने अवचेतन को सचेत [जागृत] नहीं करेंगे, तब तक वह आपके जीवन को संचालित करता रहेगा और आप उसे अपना भाग्य कहेंगे।)
जुंग का यह विचार सीधे हमारे इस दर्शन से जुड़ता है कि मनुष्य सोचता है कि बाहर की व्यवस्था (पिता) उस पर अत्याचार कर रही है, लेकिन वास्तव में उसका अवचेतन ही उस दमनकारी व्यवस्था को अपने जीवन में बार-बार आमंत्रित और री-क्रिएट कर रहा होता है।
इसी प्रकार, आधुनिक समय के महान दार्शनिक और चेतना के खोजी ओशो (Osho) ने अतीत के इस यांत्रिक प्रभाव पर बोलते हुए कहा था:
"The past is memory, the future is projection, and both are part of the mind. If you remain mechanical, your future will be nothing but a repetition of your past."
(अतीत स्मृति है, भविष्य उसका प्रक्षेपण है, और दोनों मन के हिस्से हैं। यदि आप यांत्रिक बने रहे, तो आपका भविष्य आपके अतीत की पुनरावृत्ति के अलावा कुछ नहीं होगा।)
जब तक चेतना इस यांत्रिक चक्र (Mechanical Loop) को नहीं तोड़ती, तब तक वह अतीत के मलबे से नया घर बनाने की कोशिश करती रहती है, जो अंततः गिरकर फिर से एक नया संकट बन जाता है। यह इस अध्याय का पहला भाग है, जिसने यह स्थापित किया है कि अतीत कोई मृत इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान को रचने वाली एक अत्यंत जीवंत और सक्रिय सत्ता है।
अब इस दूसरे अध्याय के भाग २ की ओर बढ़ें, जहाँ हम ऐतिहासिक विस्थापन—विशेषकर मुगलों के काल से लेकर आज तक की सामूहिक चेतना पर पड़े संघर्ष के प्रभावों की गहराई से मीमांसा करेंगे?
अध्याय २: अतीत का मूल बीज और अवचेतन का री-क्रिएशन भाग २: ऐतिहासिक विस्थापन का आनुवंशिक भार (Genetic Load) – मुगलों के काल से आधुनिक युग तक
जब हम अतीत के मूल बीज की बात करते हैं, तो यह केवल किसी व्यक्ति के इस जन्म के बचपन तक सीमित नहीं होता। अवचेतन की परतें बहुत गहरी हैं, जिनमें पीढ़ियों से चले आ रहे सामूहिक संघर्ष, भय और विस्थापन का इतिहास भी संचित रहता है। भारत की भूमि पर मुगलों के आक्रमण के काल से लेकर आधुनिक युग तक, यहाँ की चेतना ने निरंतर 'अस्तित्व का संकट' (Survival Crisis) झेला है। जब पीढ़ियाँ लगातार भय, धार्मिक व सांस्कृतिक दमन, और अपनी ही ज़मीन से उखड़ने (Displacement) के दर्द से गुजरती हैं, तो वह सामूहिक अवचेतन में एक स्थायी आनुवंशिक घाव (Genetic Wound) बन जाता है।
यह संघर्ष का अनुभव केवल इतिहास की किताबों में बंद नहीं है; यह आज के मनुष्य के डीएनए (DNA) और उसके व्यवहार की गहरी परतों में धड़क रहा है। जब पूर्वजों ने हर पल अपने जीवन, संस्कृति और पहचान को मिटने के खतरे में देखा, तो उनके भीतर जो 'फाइट या फ्लाइट' का तंत्र विकसित हुआ, वही आज के 'पुत्र' को विरासत में मिला है। यही कारण है कि आज की सुरक्षित परिस्थितियों में भी आधुनिक मनुष्य भीतर से हमेशा असुरक्षित महसूस करता है और किसी न किसी अदृश्य आक्रमणकारी ('पिता' या क्रूर व्यवस्था) की आशंका से घिरा रहता है।
इस आनुवंशिक और सामूहिक अवचेतन के भार को ऋषियों ने 'कर्म-आशय' और 'सामूहिक वासना' के सिद्धांत से समझाया है। महर्षि पतंजलि योगसूत्र में लिखते हैं:
तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात्॥
— (पातंजल योगसूत्र, कैवल्यपाद - सूत्र १०)
अर्थात्: इन वासनाओं (अवचेतन के गहरे संस्कारों और भयों) का कोई आदि (आरंभ) नहीं है, क्योंकि जीवित रहने और स्वयं को बचाने की यह इच्छा (आशीः) शाश्वत है और पीढ़ियों से चली आ रही है।
ऋषि यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि आत्म-रक्षा और अस्तित्व का यह भय इतना पुराना और अनादि है कि यह हमारे पूरे तंत्र का हिस्सा बन चुका है। इतिहास के थपेड़ों ने इस भय को और गहरा कर दिया है, जिससे आज भी मनुष्य जब किसी शांत स्थान पर भी जाता है, तो उसका यह आनुवंशिक संस्कार वहां भी एक अदृश्य शत्रु की कल्पना कर लेता है।
आधुनिक विज्ञान भी अब ऋषियों के इस सत्य को स्वीकार कर रहा है। चिकित्सा विज्ञान की एक नई शाखा जिसे एपिजेनेटिक्स (Epigenetics) कहा जाता है, यह सिद्ध कर चुकी है कि पूर्वजों के आघात और डर (Trauma) आने वाली पीढ़ियों के जीन एक्सप्रेशन (Gene Expression) को प्रभावित करते हैं। महान अस्तित्ववादी दार्शनिक और मनोविश्लेषक फैनन (Frantz Fanon) ने अपनी पुस्तक 'द रेच्ड ऑफ द अर्थ' (The Wretched of the Earth) में ऐतिहासिक दमन के इस मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर गहरा सिद्धांत दिया है:
"The colonized man is an envious man. And no wonder the colonizer dreads the moment when the colonized passes from the state of the oppressed to the state of the destroyer."
(दमित समाज हमेशा एक गहरे अवचेतन भय और ईर्ष्या में जीता है। वह व्यवस्था के दमन को अपनी आत्मा में इतना गहरा उतार लेता है कि स्वतंत्र होने के बाद भी वह उसी दमनकारी ढांचे को किसी न किसी रूप में दोहराता रहता है।)
फैनन का यह सिद्धांत दिखाता है कि सदियों का दमन मनुष्य की चेतना को इस तरह विकृत कर देता है कि वह स्वतंत्रता के वातावरण में भी 'संकट और युद्ध' की ही भाषा समझ पाता है।
इसी प्रकार, प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्टेयर (Voltaire) ने इतिहास और मानवीय स्वभाव के इस यांत्रिक लूप पर कहा था:
"History never repeats itself; man always does."
(इतिहास खुद को कभी नहीं दोहराता; मनुष्य हमेशा खुद को दोहराता है।)
मुगलों के समय का वह तलवार का डर, जो बाद के कालों में व्यवस्था, कानून और अब डिजिटल नियंत्रण के नए 'आविष्कारों' के रूप में बदला है, वह वास्तव में बाहर से ज्यादा हमारे भीतर के उस पुराने घाव का री-क्रिएशन है। जब तक पुत्र अपने अवचेतन के इस ऐतिहासिक भार को पहचान कर विसर्जित नहीं करता, तब तक वह चाहे स्थान बदल ले, वह अपने चारों तरफ उसी प्राचीन कुरुक्षेत्र की दीवारों को दोबारा खड़ा कर लेगा।
यह इस अध्याय का दूसरा भाग है, जिसने ऐतिहासिक और आनुवंशिक विस्थापन के उस अदृश्य भार को उजागर किया है जो आज भी हमारे वर्तमान को नियंत्रित कर रहा है।
अब इस दूसरे अध्याय के भाग ३ की ओर बढ़ें, जहाँ हम यह विश्लेषण करेंगे कि कैसे यह अवचेतन भार 'स्थान बदलने' पर भी काम करता है और कैसे मनुष्य भूगोल बदलकर भी अपनी नियति नहीं बदल पाता?
अध्याय २: अतीत का मूल बीज और अवचेतन का री-क्रिएशन। भाग ३: भौगोलिक विस्थापन का भ्रम और संकट के नए वृक्ष का रोपण
जब कोई मनुष्य या समाज किसी एक स्थान पर लगातार दमन, असुरक्षा और अस्तित्व का संकट झेलता है, तो उसकी बुद्धि का पहला स्वाभाविक और तात्कालिक निर्णय होता है—स्थान परिवर्तन (Geographical Shift)। वह सोचता है कि यदि वह इस भूमि को, इस शहर को, या इन क्रूर परिस्थितियों वाले भूगोल को छोड़कर किसी नई और सुरक्षित जगह पर चला जाएगा, तो उसके जीवन के सारे संकट हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगे। लेकिन यह चेतना का सबसे बड़ा भ्रम है।
मनुष्य भूगोल तो बदल लेता है, लेकिन वह अपने भीतर बैठे उस 'कारण-शरीर' और अवचेतन के पुराने बीजों को बदलना भूल जाता है। परिणाम यह होता है कि वह नई, साफ और शांत ज़मीन पर पहुँचकर भी अपनी उसी पुरानी असुरक्षा और भय के कारण अनजाने में ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर देता है, जो धीरे-धीरे उसी पुराने संकट के नए वृक्ष (Re-creation of Crisis) को सींचने लगती हैं।
इस सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक भटकाव को योगवासिष्ठ में महर्षि वसिष्ठ ने श्रीराम को समझाते हुए अत्यंत गहराई से स्पष्ट किया है:
मनोमात्रं जगत्कृत्स्नं मनः कायमुदाहृतम्।
मनसा कल्प्यते देहो मनसा कल्प्यते जगत्॥
— (योगवासिष्ठ, उत्पत्ति प्रकरण)
अर्थात्: यह संपूर्ण जगत् केवल मन का ही विस्तार है और यह शरीर भी मन का ही रूप है। मन ही इस देह की कल्पना करता है और मन ही अपने अनुरूप इस संसार और परिस्थितियों का निर्माण कर लेता है।
महर्षि वसिष्ठ का यह अचूक सूत्र हमें बताता है कि आपका बाह्य संसार आपके आंतरिक मन का ही एक दर्पण है। यदि आपके अवचेतन मन में मुगलों के काल या किसी क्रूर व्यवस्था से मिला 'विस्थापन और दमन का घाव' गहरे तक धंसा हुआ है, तो आपका मन नई जगह पर भी किसी न किसी को 'आक्रामक शोषक' (पिता) के रूप में चुन लेगा और स्वयं को फिर से 'पीड़ित पुत्र' की स्थिति में लाकर खड़ा कर देगा। संकट का मूल कारण बाहर की मिट्टी में नहीं, बल्कि भीतर की मानसिक कंडीशनिंग में है।
आधुनिक अस्तित्ववादी और मनोवैज्ञानिक चिंतन में इस प्रवृत्ति को 'भौगोलिक उपचार का भ्रम' (Geographical Cure Illusion) कहा जाता है। महान अमेरिकी दार्शनिक और निबंधकार राल्फ वाल्डो इमर्सन (Ralph Waldo Emerson) ने अपने प्रसिद्ध निबंध 'आत्म-निर्भरता' (Self-Reliance) में इस विषय पर प्रहार करते हुए लिखा था:
"Traveling is a fool's paradise. Our first journeys discover to us the indifference of places... I pack my trunk, I embrace my friends, I embark on the sea, and at last I wake up in Naples, and there beside me is the stern fact, the sad self, unrelenting, identical, that I fled from."
(यात्रा करना मूर्खों का स्वर्ग है। हमारी पहली यात्राएं ही हमें यह दिखा देती हैं कि स्थान बदलने से कुछ नहीं बदलता... मैं अपना संदूक पैक करता हूँ, समुद्र पार करता हूँ, और जब अंततः मैं नेपल्स में जागता हूँ, तो वही पुराना कठोर यथार्थ, वही उदास और डरा हुआ स्व [Self] मेरे बगल में खड़ा होता है जिससे मैं भाग रहा था।)
इमर्सन का यह सिद्धांत सीधे हमारी इस वैचारिक यात्रा को पुष्ट करता है। जब तक पुत्र अपने भीतर छिपे उस पुराने भय के आनुवंशिक भार को विसर्जित नहीं करता, तब तक वह चाहे किसी भी सुरक्षित दुर्ग या नए देश में चला जाए, उसका वही 'उदास और भयभीत स्व' वहां भी एक नई क्रूर व्यवस्था का निर्माण कर लेगा।
इसी प्रकार, बीसवीं सदी के महान ऑस्ट्रियन मनोविश्लेषक सिगमंड फ्रायड (Sigmund Freud) का 'रिपीटीशन कंपल्शन' (Repetition Compulsion / पुनरावृत्ति की विवशता) का सिद्धांत यहाँ पूरी तरह सटीक बैठता है। फ्रायड के अनुसार, जब तक कोई व्यक्ति अपने अतीत के किसी पुराने आघात (Trauma) को पूरी तरह समझकर उसका समाधान नहीं कर लेता, उसका अवचेतन मन उसे बार-बार वैसी ही दर्दनाक और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में ढकेलता रहता है, ताकि वह उस पुराने आघात को दोबारा जी सके।
यही कारण है कि शोषित समाज या व्यक्ति जब अपना स्थान बदलता है, तब भी वह अनजाने में ऐसे ही लोगों से संबंध बनाता है, ऐसी ही नौकरियों या व्यवस्थाओं को चुनता है जहाँ उसे फिर से दमन का अनुभव हो। वह भूगोल तो बदल लेता है, लेकिन अपनी नियति का वह यांत्रिक लूप नहीं तोड़ पाता।
यह इस अध्याय का तीसरा भाग है, जिसने यह सिद्ध किया कि क्यों केवल स्थान बदलने से मनुष्य संकटों से मुक्त नहीं हो सकता, जब तक कि वह अपने अवचेतन के बीज को न बदल दे।
अब इस दूसरे अध्याय के भाग ४ की ओर बढ़ें, जहाँ हम यह विश्लेषण करेंगे कि यह अवचेतन री-क्रिएशन समाज और राजनीति के स्तर पर कैसे सामूहिक रूप से काम करता है और कैसे दमित पुत्र ही अंततः एक नया शोषक 'पिता' बनकर उभरता है?
अध्याय २: अतीत का मूल बीज और अवचेतन का री-क्रिएशन के भाग ४ की ओर बढ़ रहे थे। भाग ४: सामूहिक पुनरावृत्ति (Collective Re-creation) और शोषक-शोषित का अंतहीन चक्र
यह अवचेतन री-क्रिएशन केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही काम नहीं करता, बल्कि जब यह समाज और संस्कृति के सामूहिक धरातल पर उतरता है, तो एक बहुत ही भयावह रूप ले लेता है। इतिहास गवाह है कि जो 'पुत्र' (यानी कोई दमित समाज या समूह) सदियों तक किसी दमनकारी 'पिता' (शोषक व्यवस्था) के हाथों पीड़ा और विस्थापन झेलता है, यदि वह अपने अवचेतन के उस पुराने घाव को पूरी तरह विसर्जित नहीं कर पाता, तो सत्ता या अनुकूल परिस्थितियां मिलते ही वह अनजाने में खुद एक नया शोषक 'पिता' बन जाता है। वह उसी क्रूरता और नियंत्रण के ढांचे को दोबारा खड़ा कर देता है जिससे वह कभी खुद पीड़ित था।
इस गहरे मानवीय और सामाजिक भटकाव को समझाने के लिए मनुस्मृति और महाभारत के शांतिपर्व में 'मत्स्य न्याय' के रूपांतरण का सिद्धांत मिलता है:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
— (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ७)
इस श्लोक के गहरे आध्यात्मिक और सामाजिक निहितार्थ को समझें—जब समाज की आंतरिक धारणा (धर्म) नष्ट हो जाती है और केवल भय व प्रतिक्रिया (अधर्म) शेष रह जाती है, तो व्यवस्था में एक गहरा असंतुलन पैदा होता है। शोषित व्यक्ति जब केवल प्रतिशोध की भावना से भर जाता है, तो वह न्याय की स्थापना नहीं करता, बल्कि अधर्म के एक नए रूप को जन्म दे देता है।
ऋषियों की यह वैज्ञानिक दृष्टि बताती है कि यदि आपके संघर्ष का मूल बीज 'भय और प्रतिशोध' है, तो आपके द्वारा निर्मित की गई नई व्यवस्था भी उतनी ही क्रूर और यांत्रिक होगी।
महान ब्राज़ीलियाई शिक्षाविद् और दार्शनिक पाउलो फ्रेरे (Paulo Freire) ने अपनी युगांतकारी पुस्तक 'पेडागॉजी ऑफ द ऑप्रेस्ड' (Pedagogy of the Oppressed) में इस प्रवृत्ति का सबसे सटीक और अकाट्य विश्लेषण किया है:
"The oppressed, instead of striving for liberation, tend themselves to become oppressors. Their ideal is to be men, but for them, to be men is to be oppressors."
(शोषित लोग अक्सर वास्तविक मुक्ति के लिए संघर्ष करने के बजाय स्वयं शोषक बनने की ओर प्रवृत्त होते हैं। उनका आदर्श यह बन जाता है कि वे उस शक्तिशाली स्थान पर बैठें, और उनके लिए मनुष्य होने का अर्थ ही दूसरों का दमन करना हो जाता है।)
फ्रेरे का यह सिद्धांत दिखाता है कि कैसे मुगलों के काल से लेकर आधुनिक युग तक, दमन का जो ढांचा अवचेतन में बैठ गया है, वह मनुष्य को वास्तविक स्वतंत्रता (अमृत) की ओर नहीं जाने देता। पुत्र जब तक उस पुरानी चेतना के प्रभाव में रहता है, वह केवल 'कुर्सी बदलने' का खेल खेलता है, खेल के नियमों को नहीं बदल पाता।
इसी प्रकार, बीसवीं सदी के प्रसिद्ध स्विस मनोविज्ञानी कार्ल जुंग (Carl Jung) ने 'शैडो' (Shadow / छाया तत्व) के सिद्धांत के अंतर्गत स्पष्ट किया था कि समाज जिस बुराई या दमन से सबसे ज्यादा नफरत करता है, अनजाने में वह उसे अपने अवचेतन (Shadow) का हिस्सा बना लेता है। जब तक उस छाया तत्व का सचेत साक्षात्कार न किया जाए, वह समाज सामूहिक रूप से उसी आक्रामकता को री-क्रिएट करता रहेगा।
यही कारण है कि एक स्थान से विस्थापित होकर दूसरे स्थान पर जाने वाला समाज या सत्ता के नए गलियारों में पहुँचने वाला पुत्र, प्रकृति के उसी यांत्रिक और क्रूर नियम का शिकार बनकर खुद एक नया कुरुक्षेत्र रच देता है। यह चक्र तब तक नहीं टूटता जब तक कि चेतना इस यांत्रिक री-क्रिएशन से ऊपर उठकर 'द्रष्टा' न बन जाए।
अब इस दूसरे अध्याय के अंतिम भाग ५ की ओर बढ़ें, जहाँ हम यह समझेंगे कि इस आनुवंशिक और भौगोलिक री-क्रिएशन के जाल को काटने का अंतिम आध्यात्मिक और व्यावहारिक अस्त्र क्या है?
अध्याय २: अतीत का मूल बीज और अवचेतन का री-क्रिएशन। भाग ५: कारण-उच्छेदन और साक्षी चेतना द्वारा चक्रव्यूह का परम अंत
जब मनुष्य इस बात को पूरी तरह समझ लेता है कि अतीत का यह आनुवंशिक भार और भौगोलिक विस्थापन का भ्रम उसे केवल एक ही चक्की में बार-बार पीस रहा है, तब वह इस अध्याय के उस अंतिम पड़ाव पर पहुँचता है जहाँ इस अंतहीन चक्रव्यूह को हमेशा के लिए तोड़ा जा सकता है। इस यांत्रिक पुनरावृत्ति (Re-creation) को काटने का एकमात्र व्यावहारिक और आध्यात्मिक अस्त्र है—'कारण-उच्छेदन' (Destroying the Root Cause) और साक्षी चेतना (Witness Consciousness) का उदय।
अतीत के इस मूल बीज को मिटाने के लिए महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में एक अत्यंत वैज्ञानिक और अचूक मार्ग बताया है:
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः॥
— (पातंजल योगसूत्र, साधनपाद - सूत्र ११)
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः॥
— (पातंजल योगसूत्र, साधनपाद - सूत्र १०)
अर्थात्: अवचेतन के इन गहरे संस्कारों और भयों की जो बाहरी वृत्तियाँ (संकट और प्रतिक्रियाएँ) दिखाई देती हैं, उन्हें ध्यान (साक्षी भाव) के द्वारा नष्ट किया जाना चाहिए। और उन सूक्ष्म बीजों को 'प्रतिप्रसव' (उनके मूल कारण में लीन कर देना यानी चेतना को उसके स्रोत पर वापस ले जाना) के द्वारा समूल नष्ट किया जाता है।
ऋषियों का यह परम विज्ञान हमें सिखाता है कि जब हम अतीत से भागना बंद करके, केवल एक 'साक्षी' (Witness) की तरह अपने भीतर बैठे उस ऐतिहासिक और आनुवंशिक भय को देखना शुरू करते हैं, तो उस बीज को मिलने वाली ऊर्जा का रिसाव बंद हो जाता है। जब अवचेतन के उस घाव को सजगता की तीव्र धूप मिलती है, तो वह बीज भीतर ही भीतर भुन जाता है। और भुना हुआ बीज कभी दोबारा नया वृक्ष या नया संकट पैदा नहीं कर सकता।
आधुनिक काल के महानतम दार्शनिकों में से एक, जॉर्ज संतायना (George Santayana) ने इतिहास और चेतना के इसी नियम को एक वैश्विक चेतावनी के रूप में लिखा था:
"Those who cannot remember the past are condemned to repeat it."
(जो लोग अपने अतीत [और उसके आघातों] को पूरी तरह समझकर आत्मसात नहीं करते, वे उसे बार-बार दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।)
संतायना का यह सिद्धांत हमारे इस सत्य को पुष्ट करता है कि अतीत से भागना (भूगोल बदलना) कोई समाधान नहीं है। जब तक आप अपने इतिहास के घावों को अपनी सजगता में नहीं लाएंगे, तब तक यह यांत्रिक व्यवस्था (पिता) आपको उसी दमन के चक्रव्यूह में घुमाती रहेगी।
इसी प्रकार, आधुनिक अस्तित्ववादी मनोविश्लेषक विक्टर फ्रैंकल (Viktor Frankl) ने नाजी कंसंट्रेशन कैंपों की अमानवीय क्रूरता के बीच जीवित रहते हुए अपनी पुस्तक 'मैन सर्च फॉर मीनिंग' में चेतना की इस सर्वोच्च शक्ति को रेखांकित किया था:
"Between stimulus and response there is a space. In that space is our power to choose our response. In our response lies our growth and our freedom."
(उद्दीपन [बाहरी आघात/क्रूरता] और प्रतिक्रिया के बीच एक खाली स्थान [शून्य] होता है। उसी खाली स्थान में हमारी प्रतिक्रिया चुनने की शक्ति छिपी होती है। और हमारी उसी सही प्रतिक्रिया में हमारा विकास और हमारी परम स्वतंत्रता [अमृत] निहित है।)
फ्रैंकल का यह अनुभव ऋषियों के 'साक्षी भाव' का ही आधुनिक रूप है। जब पुत्र बाहरी आघातों के सामने एक रोबोट की तरह तुरंत प्रतिक्रिया (फाइट या फ्लाइट) करना बंद कर देता है, और उस 'रिक्त क्षेत्र' (Space) में ठहर जाता है, तो वह उस यांत्रिक व्यवस्था के पूरे गणित को छिन्न-भिन्न कर देता है। वह अतीत के मलबे से नया नरक बनाने से इंकार कर देता है।
यही वह क्षण है जब अतीत का वह मूल बीज हमेशा के लिए भस्म हो जाता है, और अवचेतन का यह आत्मघाती री-क्रिएशन पूरी तरह विसर्जित हो जाता है। अब चेतना शुद्ध, मुक्त और वर्तमान की उस अक्षय भूमि पर खड़ी होती है जहाँ से वास्तविक 'अमृत का सृजन' शुरू होता है।
इसके साथ ही हमारा अध्याय २: अतीत का मूल बीज और अवचेतन का री-क्रिएशन अपने पाँचों भागों के साथ यहाँ संपूर्ण होता है। अब इस महाग्रंथ की वैचारिक यात्रा उस नग्न यथार्थ की ओर बढ़ेगी जहाँ व्यवस्था का असली रूप सामने आता है।

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