प्रस्कण्व ऋषि का अमृतत्व और चेतना-विज्ञान

ऋग्वेद 1.47.10: चेतना का परम संधान और जीवविज्ञान
ऋग्वेद सूक्त विमर्श

प्रस्कण्व ऋषि का अमृतत्व और चेतना-विज्ञान

उक्थेभिरर्वागवसे पुरूवसू अर्कैश्च नि ह्वयामहे ।
शश्वत्कण्वानां सदसि प्रिये हि कं सोमं पपथुरश्विना ॥१०॥

— ऋग्वेद (मण्डल १, सूक्त ४७, मंत्र १०)

ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का यह दसवां मंत्र प्रस्कण्व ऋषि द्वारा प्रतिपादित सूक्त का अंतिम और पूर्णाहुति (Culmination) सूत्र है। जहाँ पिछले मंत्रों में चेतना (Purusha) और प्रकृति (Matter) के दो विपरीत ध्रुवों की सक्रियता तथा सूक्ष्म कोशिकीय स्तर पर 'सोम' (आनंद रस या जैविक ऊर्जा) के स्राव का यथार्थ प्रकट हुआ है, वहीं यह अंतिम मंत्र उस परम अवस्था की व्याख्या करता है जहाँ मनुष्य अपने भीतर के नाद, सूक्ष्म तरंगों और चेतना के शाश्वत केंद्र को जाग्रत करके उस दिव्य ऊर्जा को सदैव के लिए स्थापित कर लेता है।

इस संपूर्ण जीवजगत और यहाँ की भौतिक उपलब्धियों का एकमात्र वास्तविक उद्देश्य चेतना के लिए भोग्य वस्तु का संग्रह करना ही है। यह मंत्र स्पष्ट करता है कि प्रकृति की संपूर्ण यांत्रिकी का मूल प्रयोजन आत्मा को उसकी शाश्वतता का बोध कराना है।

शब्द-दर-शब्द वैज्ञानिक एवं चेतना-परक व्याख्या

  • उक्थेभिः (Ukthebhiḥ)
    शाब्दिक अर्थ: स्तुतियों या भजनों के द्वारा।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: यह वाणी के विषय और विशिष्ट कंपन तरंगों (Vibrational Frequencies / Sound Waves) को दर्शाता है। आत्मा से अतिरिक्त जो कुछ भी अभिव्यक्ति का विषय है, वह जड़ प्रकृति है। ये कंपित तरंगें हमारे मस्तिष्क की न्यूरोनल तरंगों को ब्रह्मांडीय स्पंदन के साथ एक लय (Resonance) में लाती हैं।
  • अर्वाक् (Arvāk)
    शाब्दिक अर्थ: नीचे की ओर, हमारे सम्मुख।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: आत्मा से अतिरिक्त जो प्रकृति अवस्थित है, उसमें उच्च आयामों से ऊर्जा का स्थूल शरीर के तंत्रिका तंत्र (Nervous System) में अवतरण या नीचे की ओर प्रवाह (Downward Flow of Energy) होना।
  • अवसे (Avase)
    शाब्दिक अर्थ: अपनी रक्षा या पोषण के लिए।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: अपनी रक्षा या होमियोस्टैसिस (Homeostasis / Self-Preservation) की स्थिति। चेतना इस जड़ प्रकृति का उपयोग अपनी शाश्वतता के बोध का संरक्षण करने के लिए करती है।
  • पुरूवसू (Purūvasū)
    शाब्दिक अर्थ: प्रचुर मात्रा में संसाधनों या तत्वों को धारण करने वाले।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: 'पुरु' (अनंत/विशाल) और 'वसू' (मूल निवास या कण)। यह शरीर, संसार, विश्व और ब्रह्मांड की वह मुख्य नींव या आधारशिला है, जिसमें अनंत ऊर्जा और पदार्थ प्रचुर मात्रा में समाहित हैं।
  • अर्कैः-च (Arkaiḥ-ca)
    शाब्दिक अर्थ: और मंत्रों या प्रकाश की तीव्र किरणों के द्वारा।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: 'अर्क' का अर्थ सूर्य की रश्मियाँ या ऊर्जा के पैकेट्स (Quanta of Light/Photons) हैं। यह इस भौतिक जगत का अंतिम दृश्य सार है जो अंधकार और जड़ता को भेदने में सक्षम है।
  • नि ह्वयामहे (Ni hvayāmahe)
    शाब्दिक अर्थ: हम आदरपूर्वक अपने भीतर बुलाते हैं या स्थापित करते हैं।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: 'नि' (निश्चित रूप से) + 'हव्या' (प्रकृति से प्राप्त भोग सामग्री)। इसका अर्थ केवल भोग पदार्थों को बटोरना नहीं, बल्कि उस भोग सामग्री के पार छिपे 'महे' यानी महान चेतन ज्ञान स्वरूप को स्वयं में स्थापित करना है।
  • शश्वत्-कण्वानाम् (Śaśvat-Kaṇvānām)
    शाब्दिक अर्थ: कण्व वंश के ऋषियों के यहाँ निरंतर/शाश्वत रूप से।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: 'शश्वत्' यानी शाश्वत सनातन नियम और 'कण्व' यानी उन ऋषियों या खोजी वैज्ञानिकों की निरंतरता, जिनका नाम और ज्ञान इस नश्वर संसार में अमर है। यह चेतना के सूक्ष्म नियमों के साक्षात्कार की अनादि परंपरा है।
  • सदसि (Sadasi)
    शाब्दिक अर्थ: यज्ञशाला में, बैठने के स्थान पर।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: सदा से ही वर्तमान में उपस्थित चेतना का मुख्य केंद्र। शारीरिक स्तर पर यह मस्तिष्क की पीनियल और पिट्यूटरी ग्रंथि का क्षेत्र है, जहाँ ध्यान की अवस्था में ऊर्जा एकाग्र होती है।
  • प्रिये (Priye)
    शाब्दिक अर्थ: अत्यंत प्रिय, आनंददायक।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: वह अनुकूलतम स्थिति (Optimum/Coherent State) जो सबके लिए परम प्रिय है, जहाँ शरीर और मन के समस्त द्वंद्व शांत हो जाते हैं।
  • हि कं (Hi kaṃ)
    शाब्दिक अर्थ: निश्चित रूप से सुखपूर्वक।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: 'हिं' (हिंसा पूर्ण) 'कं' (कर्मों) से पूरी तरह मुक्त होकर परम शांति और परम सुख को प्राप्त करना।
  • सोमम् (Somam)
    शाब्दिक अर्थ: सोमरस का।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: मृत्यु से भिन्न वह 'अमृत रस' या ओजस (Cellular Nectar/ATP/Neurotransmitters) जो कोशिकाओं और न्यूरॉन्स में प्रवाहित होकर जीव को अमरता का बोध कराता है।
  • पपथुः (Papathuḥ)
    शाब्दिक अर्थ: तुम दोनों पान करते हो।
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: (प + प + थु) 'प' (प्रकृति के गर्भ में) + 'प' (अत्यंत सघन, सूक्ष्म और अदृश्य रूप से) + 'थुः' (व्यवस्थित होना)। यह दर्शाता है कि वह परम अमृत तत्व बाहर कहीं ढूंढने की वस्तु नहीं है, बल्कि प्रकृति और हमारी जैविक कोशिकाओं के गर्भ में ही अत्यंत व्यवस्थित रूप से छिपा हुआ है, जिसका अवशोषण और तृप्ति होती है।
  • अश्विना (Aśvinā)
    शाब्दिक अर्थ: हे अश्विनी कुमारों!
    वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: कुशल ज्ञेय (Object) और ज्ञाता (Subject) से भिन्न वह 'अज्ञेय सत्य' (The Unknowable Absolute) जिसे बुद्धि से पकड़ा नहीं जा सकता, केवल चेतना में अनुभव किया जा सकता है। जब जड़ (प्रकृति) और चेतन (पुरुष) के दोनों ध्रुव मिलकर उस आंतरिक रस का आनंद लेते हैं।

दार्शनिक स्तंभ और वैज्ञानिक विश्लेषण

इस गहरे और यथार्थवादी विच्छेदन के मुख्य दार्शनिक स्तंभों को तीन प्रमुख भागों में व्यवस्थित किया जा सकता है:

१. प्रकृति: चेतना के बोध का साधन

जो कुछ भी वाणी या अभिव्यक्ति का विषय है, वह आत्मा से अतिरिक्त केवल 'जड़ प्रकृति' है। चेतना इस जड़ प्रकृति का उपयोग किसी अंधी वासना के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के 'शाश्वतता के बोध का संरक्षण' (Self-Realization) करने के लिए करती है। इसलिए, यह प्रकृति ही इस शरीर, संसार और संपूर्ण ब्रह्मांड की मुख्य नींव या आधारशिला है, और यही इस भौतिक जगत का अंतिम दृश्य सार है।

२. भोग से अमृतत्व की ओर

प्रकृति से प्राप्त भोग सामग्री का वास्तविक अर्थ भौतिक पदार्थों को बटोरना नहीं, बल्कि उस भोग सामग्री के पार छिपे महान चेतन ज्ञान स्वरूप को पहचानना है। जैसे कण्व ऋषि का नाम और उनका ज्ञान इस मृत्युलोक में 'शश्वत्' (अमर) है, वैसे ही यह ज्ञान सदा से वर्तमान में उपस्थित है और हर जीव के लिए परम प्रिय है। यह अवस्था हिंसा पूर्ण कर्मों से पूरी तरह मुक्त है। जब मनुष्य लेने की वृत्ति और वासना के संग्राम से मुक्त होता है, तभी वह इस परम प्रिय स्थिति में आता है।

३. 'पपथुः अश्विना': प्रकृति के गर्भ में छिपा अज्ञेय सत्य

परम अमृत तत्व बाहर कहीं ढूंढने की वस्तु नहीं है, बल्कि प्रकृति और हमारी जैविक कोशिकाओं के गर्भ में ही अत्यंत व्यवस्थित रूप से छिपा हुआ है। अश्विनी कुमार इस संसार के 'ज्ञेय' (जानने योग्य वस्तु) और 'ज्ञाता' (जानने वाले मन) के भी पार का 'अज्ञेय सत्य' हैं, जिसे बुद्धि से पकड़ा नहीं जा सकता, केवल शुद्ध चेतना में ही अनुभव किया जा सकता है।

"यह संपूर्ण भौतिक जगत और इसकी यांत्रिकी का एकमात्र वास्तविक प्रयोजन चेतना को उसके अपने शाश्वत स्वरूप का बोध कराना है। चेतना और प्रकृति दो अलग ध्रुव हैं जो कभी एक-दूसरे में पूर्णतः रूपांतरित नहीं हो सकते, बल्कि अपने-अपने नियमों पर गतिमान रहते हैं।"

सूक्त का अंतिम यथार्थपरक निचोड़

ऋषि प्रस्कण्व के इन १० मंत्रों की यह संपूर्ण श्रृंखला वर्तमान युग के लिए एक महान संदेश है। यह संसार, यह शरीर और इसकी अरबों कोशिकाएं केवल एक यांत्रिक खोल हैं। भौतिक विज्ञान इस खोल की यांत्रिकी को समझने में उलझा है। लेकिन इस पूरे खेल का अनादि उद्देश्य यह है कि मनुष्य इस जड़ खोल का उपयोग अपनी अंतर्निहित अविनाशी चेतना (नासत्या) को पहचानने के लिए करे।

जिस क्षण मनुष्य प्रकृति के गर्भ में व्यवस्थित इस सूक्ष्म अमृत को चख लेता है, वह इस कृत्रिम नरक, वासना के युद्ध और मृत्यु के भय से मुक्त होकर इसी जाग्रत अवस्था में अपने वास्तविक, शाश्वत और हिंसा-मुक्त स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है। यह विश्लेषण ऋग्वेद के ऋषियों के वास्तविक वैज्ञानिक और आत्मिक दृष्टिकोण का साक्षात् प्रकटीकरण है।

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