अध्याय १: दृष्टिकोण की भूल और भयंकर समस्या का भ्रम

 

अध्याय १: दृष्टिकोण की भूल और भयंकर समस्या का भ्रम

अंतिम ब्रह्माण्डीय संग्राम का शंखनाद

 (The Cosmic Deterrence: War of Consciousness Against the Matrix of Entropy)

मूल विषय: जीवन को एक 'समस्या' मानकर सुलझाने की यांत्रिक चेष्टा और मनुष्य का स्वयं एक उलझन बन जाना।

  दर्शन: सहजता का अंत और 'फाइट या फ्लाइट' मोड में जीने वाली चेतना का आत्म-विनाश।

अध्याय १: दृष्टिकोण की भूल और भयंकर समस्या का भ्रम -भाग १: समस्या-दृष्टि का जन्म और 'फाइट या फ्लाइट' मोड का मानसिक जाल

इस ब्रह्मांडीय महासंग्राम की पहली और सबसे सूक्ष्म शुरुआत किसी बाहरी युद्धभूमि में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर तब होती है जब वह जीवन को एक 'अनुभव' के बजाय एक 'भयंकर समस्या' के रूप में देखना शुरू करता है। यह दृष्टिकोण की वह पहली भूल है, जो चेतना के पतन का कारण बनती है।

जब कोई व्यक्ति जीवन को एक समस्या मान लेता है, तो उसका पूरा अस्तित्व, उसकी बुद्धि और उसकी जैविक प्रणाली (Biological System) निरंतर एक रक्षात्मक और हिंसक मुद्रा में आ जाती है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे 'फाइट या फ्लाइट' (Fight or Flight) मोड कहा जाता है। इस अवस्था में मनुष्य का मस्तिष्क लगातार तनाव के रसायनों का स्राव करता है, जिससे उसकी निर्णय लेने की क्षमता कुंठित हो जाती है। वह हर समय एक ऐसे अदृश्य शत्रु से लड़ रहा होता है, जो वास्तव में बाहर है ही नहीं, बल्कि उसके अपने ही अवचेतन का एक प्रक्षेपण (Projection) है।

ऋषियों ने इस मानसिक भटकाव और दृष्टिकोण की भूल को बहुत पहले पहचान लिया था। ईशावास्योपनिषद् का एक अत्यंत प्रसिद्ध मंत्र इस सत्य को उजागर करता है:

 यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः।
 तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥

 — (ईशावास्योपनिषद्, मंत्र ७)

अर्थात्: जिस अवस्था में परम ज्ञानी मनुष्य के लिए सभी भूत (प्राणी और परिस्थितियां) आत्मरूप ही हो जाते हैं, उस एकत्व को देखने वाले के लिए कहाँ मोह और कहाँ शोक?

उपनिषद् का यह सूत्र हमें बताता है कि जब तक मनुष्य संसार को अपने से अलग, एक शत्रु या समस्या के रूप में देखता है, तब तक शोक और मोह (तनाव और अवसाद) उसका पीछा नहीं छोड़ते। समस्या जीवन में नहीं है, समस्या उस 'द्वैत' (Duality) में है जहाँ मनुष्य खुद को एक पीड़ित (Victim) और संसार को एक शोषक (Victimizer) मान लेता है।

दुनिया के महानतम बुद्धिजीवियों और दार्शनिकों ने भी इस 'समस्या-दृष्टि' के खतरे को गहराई से रेखांकित किया है। आधुनिक मनोविज्ञान के जनक सिगमंड फ्रायड (Sigmund Freud) के शिष्य और महान दार्शनिक कार्ल जुंग (Carl Jung) ने कहा था:

 "Neurosis is always a substitute for legitimate suffering." (मनोविकार हमेशा वास्तविक कष्ट के स्थान पर मन द्वारा चुनी गई एक कृत्रिम समस्या है।)

जुंग का यह सिद्धांत हमारे इस यथार्थ को पुष्ट करता है कि जब मनुष्य जीवन के स्वाभाविक प्रवाह और उसके उतार-चढ़ाव को स्वीकार करने का साहस खो देता है, तो उसका अवचेतन मन स्वयं ही कई काल्पनिक और भयंकर समस्याएं खड़ी कर लेता है ताकि वह अपनी 'संघर्ष करने वाले योद्धा' की झूठी पहचान (Ego Identity) को बनाए रख सके।

इसी प्रकार, स्टोइक (Stoic) दर्शन के महान रोमन सम्राट और दार्शनिक मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius) ने अपनी पुस्तक 'मेडिटेशन्स' में लिखा था:

 "The universe is change; our life is what our thoughts make it." (ब्रह्मांड निरंतर परिवर्तन है; हमारा जीवन वैसा ही बन जाता है जैसा हमारी सोच उसे बनाती है।)

यदि हमारी सोच ही जीवन को एक 'भयंकर समस्या' के चश्मे से देख रही है, तो यह पूरी सृष्टि हमारे लिए एक नरक का रूप ले लेगी। जो व्यक्ति लगातार इस भ्रम में जीता है कि उसे हर समय कुछ न कुछ 'हल' (Solve) करना है, वह अंततः स्वयं ही एक जटिल पहेली और समस्या बन जाता है। उसकी सहजता समाप्त हो जाती है, उसका आनंद विलीन हो जाता है, और वह उस 'मूल पिता' (यानी इस यांत्रिक संसार के नियंता) के बिछाए गए मानसिक जाल में पूरी तरह फंस जाता है।

यह इस अध्याय का पहला भाग है, जिसने यह स्थापित किया है कि कैसे हमारी 'समस्या-दृष्टि' ही हमारे विनाश का पहला बीज बोती है।

अब इस पहले अध्याय के भाग २ की ओर बढ़ें, जिसमें हम यह चर्चा करेंगे कि कैसे यह समस्या-दृष्टि मनुष्य के भीतर एक 'मार्टियर कॉम्प्लेक्स' (Martyr Complex - शहीद होने का अहसास) पैदा करती है और वह अपनी ही समस्याओं से प्रेम करने लगता है?

अध्याय १: दृष्टिकोण की भूल और भयंकर समस्या का भ्रम

भाग २: 'मार्टियर कॉम्प्लेक्स' और समस्याओं से अवचेतन का मोह


जब जीवन को एक 'भयंकर समस्या' मानने का यह दृष्टिकोण गहरा हो जाता है, तो मनुष्य के भीतर एक अत्यंत सूक्ष्म और आत्मघाती मनोवैज्ञानिक स्थिति का जन्म होता है, जिसे आधुनिक मनोविज्ञान में 'मार्टियर कॉम्प्लेक्स' (Martyr Complex - शहीद होने का अहसास) कहा जाता है। इस अवस्था में, व्यक्ति अनजाने में अपनी ही परेशानियों, दुखों और संघर्षों से प्रेम करने लगता है। उसका अवचेतन मन यह मान लेता है कि उसका अस्तित्व, उसकी महानता और उसकी पहचान केवल तभी तक है, जब तक वह किसी बहुत बड़े संकट से जूझ रहा है।


यदि ऐसे व्यक्ति के जीवन से सारी व्यावहारिक समस्याएं रातों-रात समाप्त कर दी जाएं, तो वह खुद को पूरी तरह शून्य और पहचान-विहीन महसूस करने लगेगा। इसलिए, उसका अपना ही अवचेतन मन वर्तमान की नई और साफ जमीन पर भी पुराने संघर्षों के नए कल्ले और शाखाएं निर्मित करने लगता है ताकि उसकी "संसार से लड़ते हुए पीड़ित योद्धा" की छवि सुरक्षित रहे।


इस आत्म-निर्मित चक्रव्यूह और मोह को समझाने के लिए महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में एक अत्यंत गहरा सूत्र दिया है:


 दुःखानुशयी द्वेषः॥

 — (पातंजल योगसूत्र, साधनपाद - सूत्र ८)

 

अर्थात्: दुःख के अनुभव के बाद जो द्वेष या कड़वाहट भीतर रह जाती है, चित्त उससे बंध जाता है।


यहाँ ऋषियों की वैज्ञानिक दृष्टि को देखिए—मनुष्य जिसे 'द्वेष' या 'परेशानी' कहता है, वास्तव में वह उसका पीछा नहीं कर रही होती, बल्कि उसका अपना चित्त ही उस दुःख के प्रभाव से चिपक जाता है। वह हर समय उसी दुःख को याद करता है, उसी की चर्चा करता है और उसी के इर्द-गिर्द अपने पूरे जीवन का ताना-बाना बुनता है। यह दुःख का एक ऐसा 'एडिक्शन' (व्यसन) है, जहाँ मनुष्य अपनी बेड़ियों को ही अपना आभूषण मान लेता है।


महान जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे (Friedrich Nietzsche) ने अपनी कालजयी पुस्तक 'दस स्पोक जारथुष्ट्र' (Thus Spoke Zarathustra) में इस प्रवृत्ति पर करारा प्रहार करते हुए लिखा था:


 "They want to be paid for being good, and for being unhappy! They love their misery because it gives them a right to despise others."


(वे अपनी अच्छाई और अपने दुखी होने की कीमत वसूलना चाहते हैं! वे अपने दुखों से इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि यह उन्हें दूसरों को तुच्छ समझने का एक नैतिक अधिकार देता है।)

 

नीत्शे का यह सिद्धांत सीधे उस 'पिता' (यांत्रिक व्यवस्था) की मानसिक चालाकी को उजागर करता है, जहाँ मनुष्य अपनी लाचारी और विकृत गंभीरता को एक नैतिक ऊँचाई देने की कोशिश करता है। वह सोचता है कि चूंकि उसका जीवन बहुत कठिन है, इसलिए वह दूसरों से अधिक श्रेष्ठ या समझदार है।


इसी संदर्भ में, आधुनिक अस्तित्ववादी दार्शनिक जीन-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre) का 'बैड फेथ' (Bad Faith / असत्य निष्ठा) का सिद्धांत यहाँ पूरी तरह सटीक बैठता है। सार्त्र के अनुसार, मनुष्य अपनी पूर्ण स्वतंत्रता से डरता है। जब उसे यह अहसास होता है कि वह अपने जीवन को बदलने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, तो वह इस जिम्मेदारी के डर से बचने के लिए बहाने गढ़ता है—"मैं क्या करूँ, मेरी परिस्थितियां ही क्रूर हैं, व्यवस्था ही ऐसी है।" वह खुद को एक वस्तु (Object) की तरह देखने लगता है जिसके साथ सिर्फ घटनाएं घटती हैं, न कि एक ऐसी चेतना के रूप में जो उन घटनाओं का रुख बदल सकती है।


जब व्यक्ति इस 'बैड फेथ' और 'मार्टियर कॉम्प्लेक्स' के जाल में फंस जाता है, तो वह भूल जाता है कि वह उस मूल पिता (सृष्टि के संचालक) के खेल का एक मोहरा मात्र बनकर रह गया है। उसकी गंभीरता उसे समाधान की ओर नहीं ले जाती, बल्कि उसे अपनी ही समस्याओं का एक यांत्रिक गुलाम बना देती है।


यह इस अध्याय का दूसरा भाग है, जिसने यह स्पष्ट किया कि कैसे मनुष्य अपने ही दुखों का पोषण खुद करने लगता है।


अब इस पहले अध्याय के भाग ३ की ओर बढ़ें, जहाँ हम यह विश्लेषण करेंगे कि कैसे यह आंतरिक समस्या-दृष्टि बाहरी प्रकृति के नियमों के साथ प्रतिध्वनित (Resonate) होती है और कैसे प्रकृति वास्तव में ऐसे परेशान व्यक्ति को और अधिक परेशान करने में सहयोग देने लगती है?


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भाग ३: मानसिक प्रतिध्वनि (Resonance) और प्रकृति का पूरक क्रूर नियम


जब मनुष्य का अवचेतन मन समस्याओं और दुखों से गहरे स्तर पर अनुकूलित (Conditioned) हो जाता है, तो आंतरिक जगत का यह विक्षोभ केवल मस्तिष्क की सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। यह ब्रह्मांड का एक अकाट्य और वैज्ञानिक नियम है कि भीतर की अवस्था ही बाहर की परिस्थितियों को आकर्षित और प्रतिध्वनित (Resonate) करती है। जब चेतना स्वयं को एक पीड़ित और पराजित इकाई मान लेती है, तो प्रकृति (यानी वह मूल पिता, जो इस यांत्रिक सृष्टि का स्वामी है) अपने क्रूर नियमों के साथ इस आंतरिक भ्रम की पुष्टि करने के लिए सक्रिय हो जाती है।


इस रहस्यमयी और अनिवार्य प्राकृतिक नियम को हमारे ऋषियों ने वेदों और उपनिषदों में 'ऋत' (Cosmic Order) के सिद्धांत के रूप में प्रतिपादित किया था। बृहदारण्यक उपनिषद् में एक अत्यंत गहन उद्घोष है:


 "यथाकारी यथाचारी तथा भवति।

 साधुकारी साधुर्भवति, पापकारी पापो भवति॥"

 — (बृहदारण्यक उपनिषद्, ४.४.५)

 

अर्थात्: मनुष्य जैसा कर्म और जैसी आंतरिक धारणा रखता है, वैसा ही वह निर्मित हो जाता है। श्रेष्ठ आचरण और धारणा वाला श्रेष्ठता को प्राप्त होता है, और दूषित व भ्रमित धारणा वाला पाप और कष्ट को प्राप्त होता है।

यहाँ ऋषि स्पष्ट कर रहे हैं कि यह सृष्टि कोई स्वतंत्र या तटस्थ वस्तु नहीं है; यह एक दर्पण है। यदि आपके भीतर लगातार यह भय और व्याकुलता बनी हुई है कि "कोई भयंकर संकट आने वाला है," तो आपकी चेतना की यह तरंगें प्रकृति के उस यांत्रिक जाल को सक्रिय कर देती हैं, और आपके जीवन में वास्तविक भौतिक संकटों की एक श्रृंखला खड़ी हो जाती है। प्रकृति आपके अवचेतन के भय को सच साबित करने में जुट जाती है।

बीसवीं सदी के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) ने भौतिकी के सिद्धांतों को चेतना से जोड़ते हुए एक बहुत प्रसिद्ध बात कही थी:


 "Everything is energy and that’s all there is to it. Match the frequency of the reality you want and you cannot help but get that reality. It can be no other way. This is not philosophy. This is physics."


(सब कुछ ऊर्जा ही है और बस इतना ही है। आप जिस यथार्थ को चाहते हैं, उसकी आवृत्ति [Frequency] से मेल बिठाइए, और आप उस यथार्थ को पाने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। यह दर्शन नहीं, यह भौतिकी है।)

 

आइंस्टीन का यह क्वांटम सिद्धांत हमारे इस दर्शन को पूरी तरह पुष्ट करता है। जब एक बुद्धिमान मनुष्य भी दृष्टिकोण की भूल के कारण अपनी मानसिक आवृत्ति (Frequency) को 'संकट और विनाश' पर सेट कर देता है, तो वह अनजाने में भौतिक संसार की उन्हीं विनाशकारी घटनाओं को अपने जीवन की ओर खींच रहा होता है।


इसी संदर्भ में, आधुनिक युग के महान दार्शनिक और विचारक जिड्डू कृष्णमूर्ति (J. Krishnamurti) ने चेतना और संसार के इस अंतर्संबंध पर गहराई से बोलते हुए कहा था:


 "You are the world, and the world is you. If there is no order within you, there cannot be order in the world."


(तुम ही संसार हो, और संसार ही तुम हो। यदि तुम्हारे भीतर कोई व्यवस्था नहीं है, तो बाहर के संसार में भी व्यवस्था नहीं हो सकती।)

 

जब मनुष्य अपने भीतर 'फाइट या फ्लाइट' का मानसिक पिंजरा बना लेता है, तो वह बाहर भी केवल युद्ध और शत्रुओं का ही सृजन कर सकता है। वह जहाँ जाएगा, वहीं एक नया कुरुक्षेत्र तैयार हो जाएगा। यह प्रकृति का वह पूरक नियम है, जहाँ वह आपके आंतरिक अज्ञान को भौतिक यथार्थ में बदलकर आपके सामने खड़ा कर देती है, ताकि आप उस चक्रव्यूह में और गहरे धंसते चले जाएं।


यह इस अध्याय का तीसरा भाग है, जिसने यह सिद्ध किया कि कैसे हमारे भीतर की व्याकुलता ही बाहर के संकटों को निमंत्रण देती है।


अब इस पहले अध्याय के भाग ४ की ओर बढ़ें, जहाँ हम यह विश्लेषण करेंगे कि इस दृष्टिकोण की भूल के कारण मनुष्य की 'ऊर्जा का क्षय' कैसे होता है और कैसे वह उस 'मूल पिता' (यांत्रिक व्यवस्था) का सबसे आसान शिकार बन जाता है?


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भाग ४: ऊर्जा का अपव्यय और यांत्रिक व्यवस्था (पिता) का आसान शिकार


जब मनुष्य आंतरिक रूप से 'फाइट या फ्लाइट' के जाल में फंस जाता है और उसकी मानसिक आवृत्ति प्रकृति के क्रूर नियमों के साथ प्रतिध्वनित होने लगती है, तब उसके अस्तित्व का सबसे आत्मघाती अध्याय शुरू होता है—ऊर्जा का तीव्र और निरंतर क्षय (Energy Depletion)।


एक बुद्धिमान मनुष्य की चेतना, जो 'अमृत का सृजन' करने और इस ब्रह्मांडीय खेल के पार देखने में सक्षम थी, वह अब अपनी पूरी जीवन-शक्ति (Prana/Vital Force) को केवल काल्पनिक और आत्म-निर्मित भौतिक समस्याओं से लड़ने में झोंक देती है। जब ऊर्जा का यह रिसाव चौबीसों घंटे होने लगता है, तो मनुष्य भीतर से पूरी तरह खोखला और थका हुआ हो जाता है। यही वह क्षण होता है जब वह 'मूल पिता' (सृष्टि की यांत्रिक और दमनकारी व्यवस्था) का सबसे आसान शिकार (Soft Target) बन जाता है। एक थकी हुई और डरी हुई चेतना को गुलाम बनाना इस व्यवस्था के लिए सबसे सरल कार्य है।


इस ऊर्जा-क्षय और उसके भयावह परिणाम को ऋषियों ने कठोपनिषद् में एक सुंदर रथ के रूपक से समझाया है:-


 यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः।

 न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति॥

 — (कठोपनिषद्, १.३.७)

 

अर्थात्: जो मनुष्य अज्ञानी है, जिसका मन वश में नहीं है और जो मानसिक रूप से अपवित्र (भय, चिंता और द्वंद्व से ग्रसित) है, वह उस परम पद (अमृत/स्वतंत्रता) को कभी प्राप्त नहीं कर पाता; बल्कि वह इस जन्म-मरण और शोषण के यांत्रिक संसार-चक्र में ही गिरा रहता है।


ऋषि यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि जब आपकी ऊर्जा अनियंत्रित इच्छाओं और अनजाने भयों में बिखर जाती है, तो आप चेतना के धरातल पर पंगु हो जाते हैं। आपकी यही बिखरी हुई और कमजोर ऊर्जा आपको उसी 'हाथी के समूह' (क्रूर व्यवस्था) का आश्रित बना देती है, जिससे आप बचने का प्रयास कर रहे थे।


आधुनिक अस्तित्ववादी और निराशावादी दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर (Arthur Schopenhauer) ने इस मानवीय लाचारी पर बहुत गहरा प्रहार किया है। अपनी मुख्य कृति 'द वर्ल्ड एज़ विल एंड रिप्रेजेंटेशन' (The World as Will and Representation) में वे लिखते हैं:


 "We are like lambs playing in the field, while the butcher eyes them and selects first one and then another; so we, in our good days, are all unconscious of the evil Fate has in store for us — sickness, poverty, mutilation, blindness, madness, death."


(हम उस मैदान में खेल रहे मेमनों की तरह हैं, जिन पर कसाई की नज़र है और वह एक-एक करके उन्हें चुन रहा है। ठीक इसी तरह, अपने अच्छे दिनों में हम उस क्रूर नियति [व्यवस्था] से पूरी तरह अनजान रहते हैं जो हमारे लिए बीमारी, दरिद्रता और मृत्यु सजाए बैठी है।)

 

शोपेनहावर का यह क्रूर यथार्थ हमें बताता है कि यदि मनुष्य केवल एक 'भौतिक समस्या' मानकर संसार से लड़ता रहेगा, तो वह कभी नहीं जीत पाएगा, क्योंकि यह यांत्रिक व्यवस्था (पिता) हर पल नए और घातक दुखों का निर्माण कर रही है। जब आपकी पूरी ऊर्जा केवल सर्वाइवल (Survival - जीवित रहने) के संघर्ष में ही समाप्त हो जाएगी, तो आप 'अमृत' का सृजन कब करेंगे?


इसी प्रकार, आधुनिक समाजशास्त्री और दार्शनिक मिशेल फूको (Michel Foucault) का 'बायो-पावर' (Bio-power / जैविक-सत्ता) और निगरानी का सिद्धांत यहाँ सटीक बैठता है। फूको के अनुसार, आधुनिक व्यवस्था (आधुनिक पिता) मनुष्य को शारीरिक रूप से बेड़ियों में नहीं बांधती, बल्कि वह उसके भीतर ऐसा मानसिक डर और अनुकूलन (Conditioning) पैदा कर देती है कि मनुष्य स्वयं ही अपनी निगरानी करने लगता है और अपनी स्वतंत्रता को व्यवस्था के चरणों में समर्पित कर देता है।


जब बुद्धिमान मनुष्य भी अपनी ऊर्जा का सारा कोष इस यांत्रिक चक्रव्यूह के सामने हार जाता है, तो वह 'पुत्र' होने का अपना गौरव खो देता है। वह उस विराट शून्य (रिक्त क्षेत्र) को भरने की क्षमता खो बैठता है और बहुसंख्यक समाज की तरह इसी अंतहीन चक्की में पिसने के लिए अभिशप्त हो जाता है।


यह इस अध्याय का चौथा भाग है, जिसने यह दिखाया कि कैसे दृष्टिकोण की भूल मनुष्य की रीढ़ (ऊर्जा) को ही तोड़ देती है।


अब इस पहले अध्याय के अंतिम भाग ५ की ओर बढ़ें, जहाँ हम इस 'दृष्टिकोण की भूल' के पूरे जाल का उपसंहार करेंगे और यह समझेंगे कि कैसे इस भ्रम को पूरी तरह 'देख लेना' ही इस भयंकर समस्या के विसर्जन (Dissolution) की शुरुआत है?


अध्याय १: दृष्टिकोण की भूल और भयंकर समस्या का भ्रम

भाग ५: भ्रम का नग्न साक्षात्कार और समस्या-दृष्टि का परम विसर्जन


जब मनुष्य ऊर्जा के इस चरम क्षय, अवचेतन के मोह और प्रकृति के पूरक क्रूर नियमों को परत-दर-परत देख लेता है, तो वह इस अध्याय के अंतिम और सबसे क्रांतिकारी बिंदु पर पहुँचता है—भ्रम का नग्न साक्षात्कार।


दृष्टिकोण की इस भूल का समाधान यह नहीं है कि हम किसी नई 'कृत्रिम' सकारात्मकता का मुखौटा पहन लें या संसार को बदलने के लिए एक और अंतहीन भौतिक युद्ध में कूद पड़ें। वास्तविक समाधान तो केवल इस बात में है कि इस पूरे खेल को इसकी समग्रता में, इसकी पूरी नग्नता में 'देख' लिया जाए। जिस क्षण बुद्धिमान मनुष्य यह देख लेता है कि समस्या बाहर की परिस्थितियों में नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे 'फाइट या फ्लाइट' के यांत्रिक जाल में है, उसी क्षण वह भयंकर समस्या जलकर भस्म हो जाती है। समस्या का हल नहीं होता, बल्कि समस्या का विसर्जन (Dissolution) हो जाता है।


इस परम सत्य और दृष्टि-परिवर्तन को श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मोह के उस पार ले जाते हुए बहुत स्पष्टता से समझाया है:


 यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।

 तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा॥

 — (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १३, श्लोक ३१)

 

अर्थात्: जिस क्षण मनुष्य भूतों (प्राणियों और भौतिक परिस्थितियों) के पृथक-पृथक भाव (अलग-अलग रूपों और समस्याओं) को एक ही परम चेतना में स्थित देखता है, और उस एक से ही सबका विस्तार देखता है, उसी क्षण वह ब्रह्म भाव (परम स्वतंत्रता और अमृत) को प्राप्त हो जाता है।


यहाँ गीता का यह सूत्र हमारी 'समस्या-दृष्टि' पर अंतिम चोट करता है। जब तक अर्जुन युद्ध और अपनों को एक 'भयंकर व्यक्तिगत समस्या' मानकर व्याकुल था, तब तक वह कातर था। लेकिन जब उसने विराट रूप में उस 'मूल पिता' के पूरे काल-चक्र को देख लिया, तो उसका भ्रम नष्ट हो गया। वह समझ गया कि यह संसार एक यांत्रिक प्रवाह है, और चेतना का धर्म केवल द्रष्टा होकर अपने हिस्से का संतुलन स्थापित करना है।


पश्चिमी दर्शन में, आधुनिक अस्तित्ववाद के प्रणेता अल्बर्ट कामू (Albert Camus) ने अपने प्रसिद्ध निबंध 'द मिथ ऑफ सिसिफस' (The Myth of Sisyphus) में इस दृष्टिकोण के विसर्जन का एक अद्भुत उदाहरण दिया है। सिसिफस को देवताओं (मूल पिता/व्यवस्था) द्वारा यह शाप मिला था कि वह एक भारी पत्थर को पहाड़ के शिखर तक ले जाए, जहाँ से वह पत्थर हर बार नीचे लुढ़क जाता था, और उसे यह यांत्रिक कार्य अनंत काल तक करना था। कामू लिखते हैं:


 "The struggle itself toward the heights is enough to fill a man's heart. One must imagine Sisyphus happy."


(शिखर की ओर किया जाने वाला संघर्ष ही मनुष्य के हृदय को भरने के लिए पर्याप्त है। हमें यह कल्पना करनी चाहिए कि सिसिफस सुखी है।)

 

कामू का यह दर्शन इस बात का प्रमाण है कि जब मनुष्य यह जान लेता है कि यह संसार एक अंतहीन और यांत्रिक चक्र है, और वह इसके सामने रोना या इसे एक 'समस्या' मानना बंद कर देता है, तो वह व्यवस्था के शाप से मुक्त हो जाता है। उसकी सजगता ही उस क्रूर खेल को एक नाटक में बदल देती है।


इसी संदर्भ में, महान ऑस्ट्रियन दार्शनिक लुडविग विट्गेन्स्टाइन (Ludwig Wittgenstein) ने अपनी पुस्तक 'ट्रेक्टेटस लॉजिको-फिलोसोफिकस' में दर्शन और समस्याओं के अंत पर बात करते हुए लिखा था:


 "The solution of the problem of life is seen in the vanishing of this problem."


(जीवन की समस्या का समाधान उस समस्या के पूरी तरह गायब [विलीन] हो जाने में ही दिखाई देता है।)

 

जब दृष्टिकोण की भूल सुधरती है, तो मनुष्य यह समझ जाता है कि 'पिता' (यांत्रिक व्यवस्था) का सबसे बड़ा डर यह नहीं है कि कोई उससे लड़े, बल्कि उसका सबसे बड़ा डर यह है कि कोई उसके इस पूरे खेल को समझकर इसके प्रति गंभीर होना बंद कर दे और 'अमृत के सृजन' में लग जाए। जब आप खेल को एक खेल की तरह देखने लगते हैं, तो सामने खड़े शत्रु की उच्छृंखलता स्वतः नियंत्रित होने लगती है।


इसके साथ ही हमारा अध्याय १: दृष्टिकोण की भूल और भयंकर समस्या का भ्रम अपने पाँचों भागों के साथ यहाँ पूर्ण होता है। इस अध्याय ने उस नींव को साफ कर दिया है जिस पर आगे का महासंग्राम लड़ा जाना है।


अंतिम ब्रह्माण्डीय संग्राम का शंखनाद भुमिका

अध्याय २: अतीत का मूल बीज और अवचेतन का री-क्रिएशन

 

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अध्याय ३: मत्स्य न्याय और व्यवस्था की नग्न क्रूरता