उपनिषदों में मौन का अर्थ और महत्व
जहाँ शब्द समाप्त होते हैं, वहीं से ब्रह्मज्ञान आरम्भ होता है
भूमिका
आधुनिक मनुष्य सोचता है—
ज्ञान शब्दों से आता है,
व्याख्या से आता है,
विवरण से आता है।
पर उपनिषद कहते हैं—
जहाँ शब्द रुक जाते हैं,
वहीं सत्य बोलता है।
इसीलिए उपनिषदों में
मौन को
सर्वोच्च ज्ञान का माध्यम माना गया है।
धर्म और अध्यात्म में अंतर ओर जीवन को समझने का आसान तरीका
मौन क्या है? (उपनिषदों के अनुसार)
मौन का अर्थ—
- बोलना बंद करना नहीं
- चुप बैठ जाना नहीं
उपनिषदों में मौन का अर्थ है—
मन का शांत हो जाना
अहंकार का विलीन हो जाना
विचारों का रुक जाना
जब भीतर शोर नहीं रहता,
तभी सत्य प्रकट होता है।
शब्द की सीमा और मौन की शक्ति
उपनिषद स्पष्ट कहते हैं—
“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह”
अर्थात्—
जहाँ से वाणी और मन
दोनों लौट आते हैं,
वहीं ब्रह्म है।
इसका अर्थ—
- शब्द ब्रह्म को व्यक्त नहीं कर सकते
- विचार उसे पकड़ नहीं सकते
इसलिए
मौन ही उसकी भाषा है।
वेदों में सोम का रहस्य जीवन शक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा
दक्षिणामूर्ति: मौन का सर्वोच्च प्रतीक
उपनिषदिक परंपरा में
दक्षिणामूर्ति शिव—
- बिना बोले
- केवल मौन से
शिष्यों को
ब्रह्मज्ञान प्रदान करते हैं।
यह दर्शाता है—
सत्य को समझाया नहीं जाता,
वह अनुभव कराया जाता है।
उपनिषदों में मौन और गुरु–शिष्य संवाद
कई स्थानों पर—
- शिष्य प्रश्न पूछता है
- गुरु मौन रहता है
यह मौन
अज्ञान नहीं,
उत्तर से भी गहरा उत्तर होता है।
गुरु का मौन कहता है—
“उत्तर बाहर नहीं,
भीतर खोजो।”
मौन और आत्मबोध का संबंध
जब मन—
- बोलता है
- सोचता है
- तर्क करता है
तब आत्मा छिपी रहती है।
जब मन—
- शांत होता है
- स्थिर होता है
तब आत्मा
स्वयं को प्रकट करती है।
इसलिए उपनिषद कहते हैं—
मौन आत्मा का द्वार है।
क्या मौन पलायन है?
नहीं।
उपनिषदों का मौन—
- संसार से भागना नहीं
- कर्म त्याग नहीं
बल्कि—
कर्म करते हुए भी
भीतर मौन में स्थित रहना।
यही स्थितप्रज्ञता है।
आधुनिक जीवन में मौन का महत्व
आज—
- शब्द बहुत हैं
- शोर बहुत है
- जानकारी बहुत है
पर—
- शांति नहीं
- स्पष्टता नहीं
उपनिषद आज भी कहते हैं—
प्रतिदिन कुछ समय
मौन में बैठो,
वही तुम्हारा
सच्चा ध्यान है।
मौन और ध्यान
उपनिषदों में ध्यान—
- मंत्र जप से आगे
- विधि से परे
मौन में टिक जाना ही
सच्चा ध्यान है।
जहाँ—
- विचार नहीं
- कल्पना नहीं
केवल
शुद्ध जागरूकता रहती है।
मौन: भय का नहीं, साहस का प्रतीक
जो व्यक्ति—
- अपने भीतर झांक सकता है
- अपने विचारों से डरता नहीं
वही मौन को सह सकता है।
इसलिए उपनिषद कहते हैं—
मौन कमजोर का नहीं,
जाग्रत का गुण है।
उपनिषदों का अंतिम संकेत
उपनिषद यह नहीं कहते—
“मौन धारण करो”
वे कहते हैं—
“तुम स्वयं मौन हो।”
शब्द, विचार, अहंकार
सब बाद में आते हैं।
निष्कर्ष
उपनिषदों में मौन—
- साधन नहीं
- नियम नहीं
बल्कि—
स्वरूप की पहचान है।
जब मन मौन होता है,
तब आत्मा बोलती है।
और वही वाणी
ब्रह्मज्ञान कहलाती है।
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