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सांख्य दर्शन क्या है? प्रकृति–पुरुष, त्रिगुण और मोक्ष का सम्पूर्ण ज्ञान



सांख्य दर्शन : प्रकृति–पुरुष सिद्धांत का वैज्ञानिक एवं दार्शनिक विवेचन (Sāṃkhya Darśana)

प्रस्तावना : सांख्य दर्शन का स्थान भारतीय दर्शन में

सांख्य दर्शन भारतीय षड्दर्शन परम्परा का सबसे प्राचीन, तर्कप्रधान और वैज्ञानिक दर्शन माना जाता है। इसका मूल उद्देश्य सृष्टि, चेतना और दुःख के कारणों का विश्लेषण कर मोक्ष का मार्ग स्पष्ट करना है। महर्षि कपिल को सांख्य दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है।

सांख्य दर्शन का नाम ही "संख्या" से बना है, जिसका अर्थ है—तत्त्वों की गणना और विवेचन। यह दर्शन अंधश्रद्धा के स्थान पर विवेक, अनुभव और तर्क को महत्व देता है।


सांख्य दर्शन की वैदिक पृष्ठभूमि

यद्यपि सांख्य दर्शन को कभी‑कभी स्वतंत्र दर्शन कहा जाता है, पर इसका मूल वैदिक है। ऋग्वेद, श्वेताश्वतर उपनिषद और भगवद्गीता में प्रकृति, पुरुष और गुणों के स्पष्ट संकेत मिलते हैं।

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि — गीता


सांख्य दर्शन का उद्देश्य

सांख्य दर्शन का मूल उद्देश्य है:

  • दुःख के कारणों की खोज
  • अविवेक (अज्ञान) का नाश
  • विवेक‑ज्ञान की प्राप्ति
  • प्रकृति और पुरुष का भेद‑बोध
  • कैवल्य (मोक्ष) की सिद्धि

द्वैत सिद्धांत : प्रकृति और पुरुष

सांख्य दर्शन का केंद्रीय सिद्धांत द्वैतवाद है। इसके अनुसार दो नित्य तत्त्व हैं:

1. प्रकृति

प्रकृति जड़, अचेतन, नित्य और परिवर्तनशील है। यही समस्त भौतिक और मानसिक जगत का कारण है।

2. पुरुष

पुरुष चेतन, अकर्ता, द्रष्टा और साक्षी है। पुरुष अनेक हैं, पर सभी समान चेतन स्वरूप वाले हैं।


त्रिगुण सिद्धांत

प्रकृति के तीन गुण हैं:

1. सत्त्व

ज्ञान, प्रकाश, शुद्धता और संतुलन का गुण।

2. रजस

क्रिया, गति, इच्छा और अस्थिरता का गुण।

3. तमस

अज्ञान, जड़ता, आलस्य और अंधकार का गुण।

समस्त जगत इन तीनों गुणों के संतुलन और असंतुलन से उत्पन्न होता है।


सांख्य के 25 तत्त्व (तत्त्वमीमांसा)

सांख्य दर्शन सृष्टि को 25 तत्त्वों में विभाजित करता है:

  1. प्रकृति (1)
  2. महत्तत्त्व / बुद्धि (1)
  3. अहंकार (1) 4–8. पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) 9–13. पाँच महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) 14–18. पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ 19–23. पाँच कर्मेन्द्रियाँ
  4. मन
  5. पुरुष

यह संरचना भारतीय दर्शन की सबसे सुव्यवस्थित दार्शनिक प्रणाली मानी जाती है।


कारण–कार्य सिद्धांत (सत्कार्यवाद)

सांख्य दर्शन सत्कार्यवाद को मानता है—कार्य कारण में अव्यक्त रूप से विद्यमान रहता है। जैसे बीज में वृक्ष।


बंधन का कारण

पुरुष स्वयं मुक्त है, परंतु अविवेक के कारण वह प्रकृति के साथ तादात्म्य कर लेता है। यही बंधन है।


मोक्ष (कैवल्य) की अवधारणा

सांख्य दर्शन में मोक्ष को कैवल्य कहा गया है।

कैवल्य का अर्थ है:

  • पुरुष का प्रकृति से पूर्ण विलगाव
  • दुःखों का पूर्ण अभाव
  • पुनर्जन्म से निवृत्ति

यह मोक्ष ज्ञान द्वारा प्राप्त होता है, न कि कर्मकाण्ड से।


सांख्य दर्शन और ईश्वर

प्राचीन सांख्य दर्शन निर्ईश्वरवादी माना जाता है, क्योंकि वह सृष्टि के लिए ईश्वर को आवश्यक नहीं मानता। पर यह नास्तिक नहीं है; यह आत्मा और कर्म को स्वीकार करता है।


योग दर्शन से संबंध

योग दर्शन, सांख्य दर्शन का व्यावहारिक पक्ष है। जहाँ सांख्य सिद्धांत देता है, वहीं योग साधना देता है।

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सांख्य दर्शन और आधुनिक विज्ञान

  • विकासवाद (Evolution)
  • मनोविज्ञान
  • गुणों का संतुलन
  • कारण‑कार्य सिद्धांत

आधुनिक विज्ञान के अनेक सिद्धांत सांख्य दर्शन से साम्य रखते हैं।


आधुनिक जीवन में सांख्य दर्शन की प्रासंगिकता

  • तनाव प्रबंधन
  • आत्म‑विवेक
  • मनोवैज्ञानिक संतुलन
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण

FAQ : सांख्य दर्शन

Q. क्या सांख्य नास्तिक है?
नहीं, यह निरीश्वरवादी होते हुए भी आध्यात्मिक है।

Q. सांख्य और वेदान्त में अंतर?
सांख्य द्वैतवादी है, वेदान्त अद्वैत।

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निष्कर्ष

सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन की वैज्ञानिक रीढ़ है। यह दर्शन स्पष्ट करता है कि दुःख का कारण बाहरी जगत नहीं, बल्कि अविवेक है। विवेक‑ज्ञान द्वारा पुरुष अपनी स्वतंत्रता को पहचान लेता है—यही कैवल्य है।



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