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अहं ब्रह्मास्मि का वास्तविक अर्थ | बृहदारण्यक उपनिषद की व्याख्या



अहं ब्रह्मास्मि का वास्तविक अर्थ

बृहदारण्यक उपनिषद के प्रकाश में “अहं ब्रह्मास्मि” का सत्य और साधना


भूमिका (Introduction)

भारतीय दर्शन में यदि किसी एक वाक्य ने:

  • सबसे अधिक आकर्षण पैदा किया
  • सबसे अधिक विवाद खड़े किए
  • और सबसे अधिक गलत समझा गया

तो वह वाक्य है—

“अहं ब्रह्मास्मि”

कुछ लोग इसे:

  • अहंकार का वाक्य समझ लेते हैं

कुछ इसे:

  • केवल दार्शनिक कल्पना मानते हैं

कुछ कहते हैं:

  • “यह साधारण मनुष्य के लिए नहीं है”

लेकिन बृहदारण्यक उपनिषद स्पष्ट करता है—

“अहं ब्रह्मास्मि” अहंकार का नहीं,
अज्ञान के विसर्जन का वाक्य है।

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“अहं ब्रह्मास्मि” कहाँ कहा गया है?

श्लोक:

अहं ब्रह्मास्मि
(बृहदारण्यक उपनिषद 1.4.10)

यह उपनिषद के सबसे महान महावाक्यों में से एक है।

महावाक्य का अर्थ:

  • कोई उपदेश नहीं
  • कोई आदेश नहीं
  • बल्कि सत्य की उद्घोषणा

शब्दार्थ से पहले भ्रम दूर करना

आइए पहले तीन शब्दों को समझें—

1️⃣ अहं (मैं)

यहाँ “अहं” का अर्थ:

  • शरीर नहीं
  • मन नहीं
  • सामाजिक पहचान नहीं

बल्कि:

शुद्ध चेतना का “मैं”


2️⃣ ब्रह्म

ब्रह्म का अर्थ:

  • कोई देवता नहीं
  • कोई आकृति नहीं

ब्रह्म का अर्थ है—

सर्वव्यापक, अनादि, निराकार चेतना


3️⃣ अस्मि (हूँ)

यह भविष्य या कल्पना नहीं है।

यह:

अभी, इसी क्षण की सच्चाई है।


अहं ब्रह्मास्मि = मैं ईश्वर हूँ? (सबसे बड़ा भ्रम)

नहीं ❌

उपनिषद कभी नहीं कहते कि—

  • यह शरीर ईश्वर है
  • यह व्यक्ति ईश्वर है

उपनिषद कहते हैं—

“जो तुम्हारे भीतर चेतना है,
वही ब्रह्म है।”

अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ:

मैं यह सीमित व्यक्ति नहीं हूँ,
मैं वही व्यापक चेतना हूँ।


यह अहंकार क्यों नहीं है?

अहंकार का स्वरूप:

  • तुलना करता है
  • श्रेष्ठ–हीन का भाव रखता है

लेकिन “अहं ब्रह्मास्मि” में:

  • कोई तुलना नहीं
  • कोई दूसरा नहीं

जब दूसरा ही नहीं, तो अहंकार किससे?

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बृहदारण्यक उपनिषद की पृष्ठभूमि

यह महावाक्य उस प्रसंग में आता है जहाँ—

  • आत्मा को शरीर, मन, प्राण से अलग किया गया है

जब सब “नेति–नेति” द्वारा हट जाता है, तब जो बचता है—

वही “अहं” है।

और वही “ब्रह्म” है।


उदाहरण 1: लहर और समुद्र

  • लहर कहे: “मैं समुद्र हूँ”

क्या यह अहंकार है? नहीं।

क्योंकि:

  • लहर समुद्र से अलग नहीं
  • समुद्र लहर से भिन्न नहीं

लहर का भ्रम:

  • “मैं अलग हूँ”

ज्ञान:

  • “मैं समुद्र ही हूँ”

यही अहं ब्रह्मास्मि है।


उदाहरण 2: आकाश और घटाकाश

  • घड़े में आकाश
  • बाहर आकाश

घड़ा टूटता है:

  • आकाश नष्ट नहीं होता

जब जीव समझता है—

“मैं देह-घड़ा नहीं,
आकाशवत चेतना हूँ”

यही महावाक्य का अनुभव है।


अहं ब्रह्मास्मि और आत्मा–बोध

बृहदारण्यक उपनिषद कहता है—

आत्मा का साक्षात्कार = ब्रह्म की पहचान

आत्मा:

  • व्यक्तिगत नहीं
  • सीमित नहीं

इसलिए आत्मा को जानना:

ब्रह्म को जानना है।


क्या यह केवल ज्ञानियों के लिए है?

नहीं।

उपनिषद कहते हैं—

  • यह सत्य सभी का है
  • लेकिन बोध सभी को नहीं होता

जैसे:

  • सूर्य सब पर चमकता है
  • पर अंधा नहीं देख पाता

अहं ब्रह्मास्मि और कर्म

एक बड़ा प्रश्न—

“यदि मैं ब्रह्म हूँ, तो कर्म क्यों?”

उपनिषद का उत्तर:

  • देह कर्म करती है
  • आत्मा साक्षी रहती है

जब यह समझ आ जाती है:

  • कर्म बंधन नहीं बनते
  • अहंकार नहीं जुड़ता

अहं ब्रह्मास्मि और विनय

विरोधाभास लगता है—

  • “मैं ब्रह्म हूँ”
  • फिर भी विनम्रता?

लेकिन सत्य यह है:

जितना गहरा यह बोध,
उतनी गहरी विनम्रता।

क्योंकि:

  • “मैं” अलग नहीं रहा
  • सब में वही ब्रह्म दिखने लगा

गलत उपयोग का खतरा

यदि कोई कहे—

  • “मैं ब्रह्म हूँ”
  • लेकिन लोभ, क्रोध, अहं बना रहे

तो यह:

ज्ञान नहीं,
वैचारिक अहंकार है।

उपनिषद चेतावनी देते हैं—

  • पहले शुद्धि
  • फिर ज्ञान

अहं ब्रह्मास्मि की साधना

बृहदारण्यक तीन चरण देता है—

1️⃣ श्रवण

महावाक्य को गुरु–शास्त्र से सुनना

2️⃣ मनन

तर्क से भ्रम हटाना

3️⃣ निदिध्यासन

निरंतर आत्म–स्मरण


व्यवहारिक जीवन में इसका अर्थ

यदि यह बोध हो जाए:

  • अपमान कम चुभता है
  • मृत्यु-भय ढीला पड़ता है
  • तुलना समाप्त होती है

क्योंकि:

जो अनंत है,
उसे क्या खोने का भय?


अहं ब्रह्मास्मि और मुक्ति

मुक्ति का अर्थ:

  • कहीं जाना नहीं

बल्कि:

भ्रम का समाप्त होना

जिस क्षण:

  • देह–अहं टूटता है

उसी क्षण:

  • ब्रह्म–बोध प्रकट होता है

आधुनिक मनुष्य के लिए संदेश

आज मनुष्य:

  • स्वयं को छोटा समझता है
  • परिस्थितियों से दब जाता है

अहं ब्रह्मास्मि कहता है—

तुम दुर्बल नहीं हो,
तुम अज्ञानी हो।

और:

अज्ञान मिट सकता है।


निष्कर्ष (Conclusion)

“अहं ब्रह्मास्मि”:

  • कोई दावा नहीं
  • कोई अहंकार नहीं

यह तो:

सत्य का स्मरण है।

जब यह स्मरण:

  • बुद्धि से हृदय में उतरता है

तब:

  • भय गिरता है
  • द्वैत टूटता है
  • जीवन शांत हो जाता है

अंतिम संदेश

तुम जो खोज रहे हो—

  • वह दूर नहीं
  • वह दूसरा नहीं

बृहदारण्यक उपनिषद कहता है—

तत्वमसि
वही तू है।

और जब यह स्पष्ट हो जाए, तो स्वतः प्रकट होता है—

अहं ब्रह्मास्मि




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