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आत्मा क्या है? | बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार आत्मा का स्वरूप



आत्मा क्या है?

बृहदारण्यक उपनिषद के श्लोकों के प्रकाश में आत्मा का सत्य


भूमिका (Introduction)

मनुष्य के जीवन का सबसे गहरा और सबसे कठिन प्रश्न है—

“मैं कौन हूँ?”

यह प्रश्न साधारण नहीं है।
यह प्रश्न तभी उठता है जब:

  • जीवन की बाहरी सफलताएँ भी संतोष न दे सकें
  • दुःख का कोई स्पष्ट कारण न दिखे
  • मृत्यु, भय और अस्थिरता मन को घेरने लगें

बृहदारण्यक उपनिषद इस प्रश्न से बचता नहीं,
बल्कि सीधे उसी पर प्रहार करता है।

यह उपनिषद न केवल वेदांत का मूल स्तंभ है,
बल्कि आत्मा-विचार की चरम अभिव्यक्ति है।


आत्मा शब्द का सामान्य भ्रम

सामान्यतः लोग आत्मा को समझते हैं—

  • कोई सूक्ष्म शरीर
  • कोई उजली आकृति
  • या मृत्यु के बाद निकलने वाली सत्ता

लेकिन बृहदारण्यक उपनिषद स्पष्ट करता है—

आत्मा कोई वस्तु नहीं है जिसे देखा जाए।
आत्मा देखने वाला है।

यहीं से उपनिषद की यात्रा शुरू होती है।

👉 तत्त्वमसि का वास्तविक अर्थ | छान्दोग्य उपनिषद की सरल व्याख्या


बृहदारण्यक उपनिषद की विशेषता

यह उपनिषद:

  • प्रश्नोत्तर के रूप में
  • संवाद शैली में
  • और अत्यंत तार्किक ढंग से

आत्मा को समझाता है।

यह कहता है—

आत्मा को मानना नहीं,
आत्मा को जानना है।


आत्मा क्या नहीं है (नेति–नेति सिद्धांत)

बृहदारण्यक उपनिषद की सबसे प्रसिद्ध पद्धति है—

“नेति नेति”
(यह नहीं, यह नहीं)

श्लोक:

नेति नेति। आत्मा ह्येतद् न इति।
(बृहदारण्यक उपनिषद 2.3.6)

अर्थ:

आत्मा यह नहीं है,
आत्मा वह नहीं है।

उपनिषद पहले यह स्पष्ट करता है कि आत्मा क्या नहीं है—

  • शरीर नहीं
  • इंद्रियाँ नहीं
  • मन नहीं
  • बुद्धि नहीं
  • अहंकार नहीं

क्योंकि:

जो देखा जा रहा है,
वह देखने वाला नहीं हो सकता।


शरीर और आत्मा का भेद

शरीर:

  • जन्म लेता है
  • बदलता है
  • नष्ट होता है

आत्मा:

  • जन्म नहीं लेती
  • बदलती नहीं
  • नष्ट नहीं होती

शरीर पर हम कहते हैं—

  • “मेरा शरीर”

यह “मेरा” शब्द ही सिद्ध करता है—

शरीर मैं नहीं है।

👉  अहं ब्रह्मास्मि का वास्तविक अर्थ | बृहदारण्यक उपनिषद की व्याख्या


आत्मा: द्रष्टा (Seeing Principle)

बृहदारण्यक उपनिषद कहता है—

द्रष्टा को देखा नहीं जा सकता।

श्लोक:

येन पश्यति तत् द्रष्टुं न शक्यते।
(भावार्थ – बृहदारण्यक)

अर्थ:

  • आँख से वस्तुएँ दिखती हैं
  • लेकिन आँख को कौन देखता है?

वह है:

आत्मा – साक्षी


आत्मा और मन का अंतर

मन:

  • कभी शांत
  • कभी अशांत
  • कभी प्रसन्न
  • कभी दुखी

यदि मन ही आत्मा होता, तो आत्मा भी बदलती।

लेकिन:

जो मन की स्थिति को जानता है,
वह मन नहीं हो सकता।

इसलिए आत्मा:

  • मन की साक्षी है
  • मन से परे है

आत्मा: श्रोता, द्रष्टा, मन्त्रा

बृहदारण्यक उपनिषद का प्रसिद्ध कथन—

श्लोक:

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।
(बृहदारण्यक उपनिषद 2.4.5)

अर्थ:

आत्मा को

  • सुनना चाहिए (श्रोतव्य)
  • समझना चाहिए (मन्तव्य)
  • और ध्यान में लाना चाहिए (निदिध्यासितव्य)

यह श्लोक आत्म-साधना का पूरा मार्ग बताता है।


आत्मा प्रिय क्यों है? (मैत्रेयी संवाद)

याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी का संवाद बृहदारण्यक का हृदय है।

याज्ञवल्क्य कहते हैं—

श्लोक:

न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति, आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।
(बृहदारण्यक उपनिषद 2.4.5)

अर्थ:

कोई भी वस्तु अपने लिए प्रिय नहीं होती,
बल्कि आत्मा के लिए प्रिय होती है।

उदाहरण:

  • पति प्रिय है → आत्मा के कारण
  • धन प्रिय है → आत्मा के कारण
  • जीवन प्रिय है → आत्मा के कारण

यदि आत्मा न हो:

कुछ भी प्रिय नहीं रह जाता।


आत्मा = चेतना (Consciousness)

बृहदारण्यक उपनिषद आत्मा को चेतना कहता है।

यह चेतना:

  • जाग्रत में है
  • स्वप्न में है
  • सुषुप्ति में भी है

नींद में:

  • न शरीर का ज्ञान
  • न मन का

फिर भी:

  • “मैं सुख से सोया” – यह स्मृति रहती है

👉 यह स्मृति किसकी है?
आत्मा की।


आत्मा और मृत्यु

मृत्यु:

  • शरीर की होती है
  • मन की होती है

आत्मा की नहीं।

बृहदारण्यक उपनिषद कहता है—

मृत्यु आत्मा को छू भी नहीं सकती।

इसलिए मृत्यु-भय:

आत्मा का नहीं,
शरीर-बोध का भय है।


आत्मा सर्वव्यापक है

आत्मा:

  • सीमित नहीं
  • विभाजित नहीं

बृहदारण्यक कहता है—

आत्मा एक है,
अनेक शरीरों में प्रतिबिंबित।

जैसे:

  • एक सूर्य
  • अनेक जल-पात्रों में दिखाई देता है

आत्मा और ब्रह्म की एकता

बृहदारण्यक उपनिषद का महावाक्य—

अहं ब्रह्मास्मि

(बृहदारण्यक उपनिषद 1.4.10)

अर्थ:

मैं ब्रह्म हूँ।

यह अहंकार नहीं, बल्कि पहचान है—

“मैं यह सीमित शरीर नहीं,
बल्कि वही व्यापक चैतन्य हूँ।”


आत्मज्ञान क्या है?

आत्मज्ञान का अर्थ:

  • कुछ नया पाना नहीं
  • बल्कि भ्रम का हट जाना

जैसे:

  • रस्सी को साँप समझ लेना
  • और प्रकाश में सत्य जान लेना

आत्मा को कैसे जाना जाए?

बृहदारण्यक तीन साधन देता है—

1️⃣ श्रवण – उपनिषदों का अध्ययन
2️⃣ मनन – तर्क से समझना
3️⃣ निदिध्यासन – निरंतर आत्म-स्मरण


आत्मा जानने का फल

जो आत्मा को जानता है—

  • वह मृत्यु से नहीं डरता
  • वह अभाव से नहीं टूटता
  • वह सफलता में नहीं बहकता

उपनिषद कहता है—

वही मुक्त है,
जो स्वयं को जान ले।


आधुनिक जीवन में आत्मा-विचार

आज:

  • पहचान शरीर से
  • मूल्य पद से
  • सुख वस्तुओं से

इसलिए:

  • भय
  • तनाव
  • असंतोष

आत्मा-बोध:

इन सबका मूल समाधान है।


निष्कर्ष (Conclusion)

बृहदारण्यक उपनिषद आत्मा को—

  • परिभाषित नहीं करता
  • बल्कि प्रकट करता है

आत्मा:

  • देखी नहीं जाती
  • जानी जाती है

और जो आत्मा को जान लेता है—

वही वास्तव में जीवन को जान लेता है।


अंतिम संदेश

तुम जो खोज रहे हो—

  • वह बाहर नहीं
  • भीतर है

बृहदारण्यक उपनिषद कहता है—

आत्मा को जानो,
सब कुछ जाना हुआ हो जाएगा।




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Agnipuran Chapter 20