तंत्रसार – पुत्रक दीक्षा विधि
संस्कृत:
अथ पुत्रकदीक्षाविधिः ॥ १४.१॥
हिन्दी अर्थ:
अब ‘पुत्रक दीक्षा’ की विधि का वर्णन किया जा रहा है।
English:
Now begins the method of Putraka initiation, a sacred spiritual initiation process.
संस्कृत:
स च विस्तीर्णः तन्त्रालोकात् अवधार्यः ॥ १४.२॥
हिन्दी अर्थ:
यह विधि विस्तार से तंत्रालोक ग्रंथ में जानी जानी चाहिए।
English:
This method is elaborately explained in the Tantraloka and should be understood from there.
संस्कृत:
संक्षिप्तस् तु उच्यते ॥ १४.३॥
हिन्दी अर्थ:
यहाँ इसका संक्षिप्त वर्णन किया जा रहा है।
English:
Here, it is being explained in a brief form.
संस्कृत:
समय्यन्तं विधिं कृत्वा तृतीयेऽह्नि त्रिशूलाब्जे मण्डले सामुदायिकं यागं पूजयेत्।
तत्र बाह्यपरिवारं द्वारदेवताचक्रं च बहिः पूजयेत्।
ततो मण्डलपूर्वभागे ऐशकोणात् आरभ्य आग्नेयान्तं पङ्क्तिक्रमेण गणपतिं गुरुं परमगुरुं परमेष्ठिनं पूर्वाचार्यान् योगिनीचक्रं वागीश्वरीं क्षेत्रपालं च पूजयेत् ॥ १४.४॥
हिन्दी अर्थ:
नियमों का पालन करने के बाद, तीसरे दिन त्रिशूल और कमल युक्त मंडल में सामूहिक यज्ञ किया जाता है।
पहले बाह्य देवताओं और द्वारपालों की पूजा होती है।
फिर मंडल के पूर्व भाग में ईशान से आग्नेय दिशा तक क्रम से गणपति, गुरु, परमगुरु, परमेष्ठी, आचार्य, योगिनीचक्र, वागीश्वरी और क्षेत्रपाल की पूजा की जाती है।
English:
After completing the prescribed rites, on the third day a collective ritual is performed in a Trishula-Lotus mandala.
External deities and gatekeepers are worshipped first.
Then in sequence, Ganapati, Guru lineage, Yoginis, Vagishwari, and Kshetrapala are invoked in the eastern section of the mandala.
संस्कृत:
तत आज्ञां समुचिताम् आदाय शूलमूलात् प्रभृति सितकमलान्तं समस्तम् अध्वानं न्यस्य अर्चयेत्।
ततो मध्यमे त्रिशूले मध्यारायां भगवती श्रीपराभट्टारिका भैरवनाथेन सह,
वामारायां तथैव श्रीमदपरा, दक्षिणारायां श्रीपरापरा।
दक्षिणे त्रिशूले मध्ये श्रीपरापरा, वामे त्रिशूले मध्ये श्रीमदपरा — द्वे तु यथास्वम् ॥ १४.५॥
हिन्दी अर्थ:
गुरु की आज्ञा लेकर सम्पूर्ण आध्यात्मिक मार्ग का न्यास किया जाता है।
त्रिशूल के मध्य में पराभट्टारिका देवी को भैरवनाथ के साथ स्थापित किया जाता है।
वाम भाग में अपरा शक्ति और दक्षिण में परापरा शक्ति की स्थापना होती है।
अन्य त्रिशूलों में भी इन्हीं शक्तियों की व्यवस्था की जाती है।
English:
With the Guru’s permission, the entire spiritual path (adhva) is installed.
At the center resides Goddess Parabhattarika with Bhairava.
Other positions represent Apara and Parapara aspects of divine energy, symbolizing the cosmic structure of consciousness.
संस्कृत:
एवं सर्वस्थानाधिष्ठातृत्वे भगवत्याः सर्वं पूर्णं तदधिष्ठानात् भवति इति ॥ १४.६॥
हिन्दी अर्थ:
इस प्रकार जब भगवती सभी स्थानों में अधिष्ठित होती हैं, तब उनके अधिष्ठान से सब कुछ पूर्ण हो जाता है।
English:
Thus, when the Divine Goddess pervades all places, everything becomes complete through Her presence.
संस्कृत:
ततो मध्यशूलमध्यारायां समस्तं देवताचक्रं लोकपालास्त्रपर्यन्तम् अभिन्नतयैव पूजयेत् तदधिष्ठानात् सर्वत्र पूजितम् ॥ १४.७॥
हिन्दी अर्थ:
फिर मध्य त्रिशूल में सभी देवताओं के चक्र, लोकपालों और अस्त्रों तक की पूजा एकरूप भाव से करनी चाहिए, क्योंकि उसके अधिष्ठान से सबकी पूजा हो जाती है।
English:
Then in the central Trident, the entire circle of deities including guardians and divine weapons is worshipped as one unity, as worship there extends everywhere.
संस्कृत:
ततः कुम्भे कलशे मण्डले अग्नौ स्वात्मनि च अभेदभावनया पञ्चाधिकरणम् अनुसंधिं कुर्यात् ततः परमेश्वराद्वयरसबृंहितेन पुष्पादिना विशेषपूजां कुर्यात् ॥ १४.८॥
हिन्दी अर्थ:
इसके बाद कुम्भ, कलश, मण्डल, अग्नि और अपने आत्मा में अभेदभाव से पाँचों अधिष्ठानों का ध्यान करना चाहिए, और फिर परमेश्वर के अद्वैत रस से युक्त होकर पुष्प आदि से विशेष पूजा करनी चाहिए।
English:
Then, by non-dual awareness, one should contemplate the five bases — pot, vessel, mandala, fire, and the self — and perform special worship with offerings imbued with divine unity.
संस्कृत:
किं बहुना तर्पणनैवेद्यपरिपूर्णं वित्तशाठ्यविरहितो यागस्थानं कुर्यात् ॥ १४.९॥
हिन्दी अर्थ:
अधिक क्या कहें—तर्पण और नैवेद्य से पूर्ण, बिना किसी कंजूसी के यज्ञ स्थान को सम्पन्न करना चाहिए।
English:
In short, the ritual space should be completed with offerings and devotion, without any miserliness or hesitation.
संस्कृत:
असति वित्ते तु महामण्डलयागो न कर्तव्य एव ॥ १४.१०॥
हिन्दी अर्थ:
यदि पर्याप्त धन न हो, तो महामंडल यज्ञ नहीं करना चाहिए।
English:
If sufficient resources are not available, the grand mandala ritual should not be performed.
संस्कृत:
पशूंश् च जीवतो निवेदयेत् ॥ १४.११॥
हिन्दी अर्थ:
पशुओं को जीवित अवस्था में ही (देवता को) समर्पित करना चाहिए।
English:
Animals should be offered while still alive (symbolically dedicated to the Divine).
संस्कृत:
तेऽपि हि एवम् अनुगृहीता भवन्ति इति कारुणिकतया पशुविधौ न विचिकित्सेत् ॥ १४.१२॥
हिन्दी अर्थ:
वे (पशु) भी इस प्रकार अनुग्रह प्राप्त करते हैं—इस करुणा भाव से पशु-विधि में संदेह नहीं करना चाहिए।
English:
Even those beings receive grace in this process; therefore, one should not doubt this ritual, understanding it through compassion.
संस्कृत:
ततोऽग्नौ परमेश्वरं तिलाज्यादिभिः संतर्प्य तदग्रेऽन्यं पशुं वपाहोमार्थं कुर्यात् देवताचक्रं तद्वपया तर्पयेत् पुनर् मण्डलं पूजयेत् ततः परमेश्वरं विज्ञप्य सर्वाभिन्नसमस्तषडध्वपरिपूर्णम् आत्मानं भावयित्वा शिष्यं पुरोऽवस्थितं कुर्यात् ॥ १४.१३॥
हिन्दी अर्थ:
इसके बाद अग्नि में परमेश्वर को तिल, घृत आदि से तृप्त किया जाता है।
फिर अन्य पशु को वपा-होम के लिए अर्पित किया जाता है और उससे देवताओं के चक्र को तर्पित किया जाता है।
फिर पुनः मण्डल की पूजा कर, परमेश्वर से प्रार्थना कर, स्वयं को सम्पूर्ण षडध्व से परिपूर्ण अनुभव करते हुए शिष्य को सामने स्थापित किया जाता है।
English:
Then, offerings like sesame and ghee are made into the fire for the Divine.
Another animal is offered symbolically for the ritual fire, and the circle of deities is satisfied.
After re-worshipping the mandala, the practitioner invokes the Divine, realizes the Self as complete, and positions the disciple before them.
संस्कृत:
परोक्षदीक्षायां जीवन्मृतरूपायाम् अग्रे तं ध्यायेत् तदीयां वा प्रतिकृतिं दर्भगोमयादिमयीम् अग्रे स्थापयेत् ॥ १४.१४॥
हिन्दी अर्थ:
परोक्ष दीक्षा में, चाहे वह जीवित हो या मृत, शिष्य का ध्यान करना चाहिए या उसकी दर्भ, गोमय आदि से बनी प्रतिमा सामने स्थापित करनी चाहिए।
English:
In indirect initiation, whether the disciple is living or deceased, one should meditate upon them or place their symbolic representation made of sacred materials.
संस्कृत:
तथाविधं शिष्यम् अर्घपात्रविप्रुट्प्रोक्षितं पुष्पादिभिश् च पूजितं कृत्वा समस्तम् अध्वानं तद्देहे न्यसेत् ॥ १४.१५॥
हिन्दी अर्थ:
उस प्रकार शिष्य को अर्घ्यजल से शुद्ध कर, पुष्प आदि से पूजित कर, सम्पूर्ण आध्यात्मिक मार्ग (अध्व) को उसके शरीर में स्थापित करना चाहिए।
English:
The disciple is purified with sacred water, worshipped with flowers, and then the entire spiritual path (adhva) is installed into their being.
संस्कृत:
तत इत्थं विचारयेत् भोगेच्छोः शुभं न शोधयेत् ॥ १४.१६॥
हिन्दी अर्थ:
इस प्रकार विचार करना चाहिए कि भोग की इच्छा रखने वाले के लिए केवल शुभ का ही शोधन करना आवश्यक नहीं है।
English:
Thus, one should understand that for a person desiring worldly enjoyment, purification of only the auspicious is not essential.
संस्कृत:
मुमुक्षोस् तु शुभाशुभम् उभयम् अपि ॥ १४.१७॥
हिन्दी अर्थ:
किन्तु मोक्ष की इच्छा रखने वाले के लिए शुभ और अशुभ दोनों का शोधन आवश्यक है।
English:
However, for one seeking liberation, both auspicious and inauspicious aspects must be purified.
संस्कृत:
निर्बीजायां तु समयपाशान् अपि शोधयेत् सा च आसन्नमरणस्य अत्यन्तमूर्खस्यापि कर्तव्या इति परमेश्वराज्ञा तस्यापि तु गुरुदेवताग्निभक्तिनिष्ठत्वमात्रात् सिद्धिः ॥ १४.१८॥
हिन्दी अर्थ:
निर्बीज दीक्षा में समय-बंधन (बंधन रूप पाश) का भी शोधन करना चाहिए।
यह दीक्षा निकट मृत्यु वाले अथवा अत्यंत अज्ञानी व्यक्ति के लिए भी करनी चाहिए—ऐसी परमेश्वर की आज्ञा है।
और ऐसे व्यक्ति को भी गुरु, देवता और अग्नि में भक्ति रखने मात्र से सिद्धि प्राप्त हो जाती है।
English:
In the seedless initiation, even the bonds of time must be purified.
This initiation should be performed even for one near death or extremely ignorant—such is the command of the Divine.
Even such a person attains success through devotion to Guru, Deity, and Fire.
संस्कृत:
अत्र च सर्वत्र वासनाग्रहणम् एव भेदकम् मन्त्राणां वासनानुगुण्येन तत्तत्कार्यकारित्वात् ॥ १४.१९॥
हिन्दी अर्थ:
यहाँ मुख्य भेद वासना (अंतर प्रवृत्ति) के आधार पर होता है, क्योंकि मंत्र उसी वासना के अनुसार अपना कार्य करते हैं।
English:
Here, the distinguishing factor is the inner tendencies (vasanas), as mantras function according to those tendencies.
संस्कृत:
एवं वासनाभेदम् अनुसंधाय मुख्यमन्त्रपरामर्शविशेषेण समस्तम् अध्वानं स्वदेहगतं शिवाद्वयभावनया शोधयेत् ॥ १४.२०॥
हिन्दी अर्थ:
इस प्रकार वासनाओं के भेद को समझकर, मुख्य मंत्र के विशेष चिंतन द्वारा, सम्पूर्ण अध्व (आध्यात्मिक मार्ग) को अपने शरीर में शिव-अद्वैत भाव से शुद्ध करना चाहिए।
English:
Thus, understanding the distinctions of inner tendencies, one should purify the entire spiritual path within oneself through focused contemplation of the primary mantra in the non-dual awareness of Shiva.
संस्कृत:
एवं क्रमेण पादाङ्गुष्ठात् प्रभृति द्वादशान्तपर्यन्तं स्वात्मदेहस्वात्मचैतन्याभिन्नीकृतदेहचैतन्यस्य शिष्यस्य आसाद्य तत्रैव अनन्तानन्दसरसि स्वातन्त्र्यैश्वर्यसारे समस्तेच्छाज्ञानक्रियाशक्तिनिर्भरसमस्तदेवताचक्रेश्वरे समस्ताध्वभरिते चिन्मात्रावशेषविश्वभावमण्डले तथाविधरूपैकीकारेण शिष्यात्मना सह एकीभूतो विश्रान्तिम् आसादयेत् इत्य् एवं परमेश्वराभिन्नोऽसौ भवति ॥ १४.२१॥
हिन्दी अर्थ:
इस प्रकार क्रमशः पादांगुष्ठ से लेकर द्वादशांत तक, शिष्य के शरीर और चेतना को अपने आत्मचैतन्य से अभिन्न कर, उसे अनंत आनंद रूप परम अवस्था में स्थापित करना चाहिए।
जहाँ सम्पूर्ण इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों से युक्त देवता-चक्र स्थित है, वहाँ शिष्य के साथ एकत्व स्थापित कर विश्राम प्राप्त किया जाता है।
इस प्रकार वह परमेश्वर से अभिन्न हो जाता है।
English:
Thus, step by step from the toe to the crown, the disciple’s body-consciousness is unified with the Self.
Established in the ocean of infinite bliss and divine sovereignty, filled with all powers of will, knowledge, and action, the practitioner merges with the disciple.
In this unity, the disciple becomes one with the Supreme Divine.
संस्कृत:
ततो यदि भोगेच्छुः स्यात् ततो यत्रैव तत्त्वे भोगेच्छा अस्य भवति तत्रैव समस्तव्यस्ततया योजयेत् ॥ १४.२२॥
हिन्दी अर्थ:
इसके बाद यदि शिष्य को भोग की इच्छा हो, तो जिस तत्त्व में उसकी इच्छा हो, उसी में उसे पूर्ण रूप से स्थापित करना चाहिए।
English:
If the disciple desires worldly enjoyment, they should be connected fully to the specific level of reality where that desire resides.
संस्कृत:
तदनन्तरं शेषवृत्तये परमेश्वरस्वभावात् झटिति प्रसृतं शुद्धतत्त्वमयं देहम् अस्मै चिन्तयेत् इत्य् एषा समस्तपाशवियोजिका दीक्षा ॥ १४.२३॥
हिन्दी अर्थ:
इसके बाद शिष्य के शेष संस्कारों के लिए परमेश्वरस्वरूप से उत्पन्न शुद्ध तत्त्वमय शरीर का ध्यान करना चाहिए।
यह दीक्षा सभी बंधनों को नष्ट करने वाली होती है।
English:
Then, for the remaining impressions, one visualizes a pure divine body emerging from the nature of the Supreme.
This initiation removes all bondage completely.
संस्कृत:
ततः शिष्यो गुरुं दक्षिणाभिः पूर्ववत् पूजयेत् ॥ १४.२४॥
हिन्दी अर्थ:
इसके बाद शिष्य को गुरु की पूर्ववत् दक्षिणा देकर पूजा करनी चाहिए।
English:
After this, the disciple should worship the Guru with offerings as prescribed.
संस्कृत:
ततोऽग्नौ शिष्यस्य विधिं कुर्यात् श्रीपरामन्त्रः अमुकस्यामुकं तत्त्वं शोधयामि इति स्वाहान्तं प्रतितत्त्वं तिस्र आहुतयः अन्ते पूर्णा वौषडन्ता ॥ १४.२५॥
हिन्दी अर्थ:
फिर अग्नि में शिष्य के लिए विधि करनी चाहिए, जिसमें ‘मैं अमुक तत्त्व का शोधन करता हूँ’ ऐसा कहते हुए प्रत्येक तत्त्व के लिए तीन आहुतियाँ दी जाती हैं और अंत में पूर्ण आहुति दी जाती है।
English:
Then, a fire ritual is performed for the disciple, offering three oblations for each element with the mantra of purification, concluding with a final complete offering.
संस्कृत:
एवं शिवान्ततत्त्वशुद्धिः ततो योजनिकोक्तक्रमेण पूर्णाहुतिः ॥ १४.२६॥
हिन्दी अर्थ:
इस प्रकार शिव तत्त्व तक सभी तत्त्वों का शोधन किया जाता है, और फिर नियमानुसार पूर्ण आहुति दी जाती है।
English:
Thus, purification is carried out up to the Shiva principle, followed by the final complete offering as prescribed.
संस्कृत:
भोगेच्छोः भोगस्थाने योजनिकार्थम् अपरा शुद्धतत्त्वसृष्ट्यर्थम् अन्या ॥ १४.२७॥
हिन्दी अर्थ:
भोग की इच्छा रखने वाले के लिए उसे उसके इच्छित तत्त्व में स्थापित करने हेतु एक प्रक्रिया होती है, और शुद्ध तत्त्व की सृष्टि के लिए दूसरी प्रक्रिया होती है।
English:
For one desiring enjoyment, one method connects them to the desired realm, while another method creates pure principles for higher realization.
संस्कृत:
ततो गुरोः दक्षिणाभिः पूजनम् इत्य् एषा पुत्रकदीक्षा ॥ १४.२८॥
हिन्दी अर्थ:
इसके बाद गुरु को दक्षिणा देकर पूजा की जाती है—इसी प्रकार यह पुत्रक दीक्षा पूर्ण होती है।
English:
Finally, the Guru is worshipped with offerings, and thus the Putraka initiation is completed.
संस्कृत:
यत्र वर्तमानम् एकं वर्जयित्वा भूतं भविष्यच् च कर्म शुध्यति ॥ १४.२९॥
हिन्दी अर्थ:
इस दीक्षा में वर्तमान कर्म को छोड़कर भूत और भविष्य के कर्म शुद्ध हो जाते हैं।
English:
In this initiation, past and future karmas are purified, leaving aside the present karma.

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