तंत्रसार – द्वादशम् आह्निकम् (12.1–12.2)
दीक्षादिकं वक्तव्यम् इति उक्तम् अतो दीक्षास्वरूपनिरूपणार्थं प्राक् कर्तव्यं स्नानम् उपदिश्यते ॥ १२.१ ॥
स्नानं च शुद्धता उच्यते शुद्धता च परमेश्वरस्वरूपसमावेशः ॥ १२.२ ॥
दीक्षा-आदिकम् = दीक्षा आदि विषय
वक्तव्यम् = कहा जाना चाहिए
इति उक्तम् = ऐसा कहा गया है
अतः = इसलिए
दीक्षा-स्वरूप-निरूपण-अर्थम् = दीक्षा के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए
प्राक् = पहले
कर्तव्यम् = किया जाना चाहिए
स्नानम् = स्नान
उपदिश्यते = उपदेश दिया जाता है
➡️ अर्थ: दीक्षा आदि का वर्णन करना है, इसलिए पहले दीक्षा के स्वरूप को समझाने के लिए स्नान करने का उपदेश दिया जाता है।
स्नानम् = स्नान
च = और
शुद्धता = पवित्रता
उच्यते = कहा जाता है
शुद्धता च = और शुद्धता
परमेश्वर-स्वरूप-समावेशः = परमेश्वर के स्वरूप में प्रवेश (एकत्व)
➡️ अर्थ: स्नान का अर्थ केवल जल से शरीर धोना नहीं है, बल्कि वास्तविक शुद्धता परमेश्वर के स्वरूप में लीन होना है।
हिन्दी व्याख्या:
तंत्रसार के इस भाग में आचार्य यह बताते हैं कि दीक्षा (spiritual initiation) केवल एक बाहरी क्रिया नहीं है, बल्कि यह एक गहन आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
जब यह कहा जाता है कि "दीक्षादिकं वक्तव्यम्", इसका अर्थ है कि अब साधक को उस मार्ग पर ले जाया जाएगा जहाँ वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सके।
इस प्रक्रिया का पहला चरण है – स्नान। सामान्य रूप से हम स्नान को केवल शरीर की सफाई समझते हैं, लेकिन यहाँ इसका अर्थ बहुत गहरा है।
यह स्नान बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है।
तंत्र के अनुसार, असली शुद्धता तब आती है जब व्यक्ति अपने सीमित अहंकार को छोड़कर परमेश्वर के स्वरूप में समाहित हो जाता है।
यही "परमेश्वरस्वरूपसमावेशः" है।
इसका अर्थ यह है कि जब तक हम अपने आपको केवल शरीर, मन और विचारों तक सीमित मानते हैं, तब तक हम अशुद्ध अवस्था में हैं।
लेकिन जब हम यह अनुभव करते हैं कि "मैं ही वह चेतना हूँ जो सबमें व्याप्त है", तब वास्तविक शुद्धता प्राप्त होती है।
इसलिए यहाँ स्नान का अर्थ है:
- अहंकार का त्याग
- मन की अशुद्धियों का नाश
- चेतना का विस्तार
यही वास्तविक दीक्षा की तैयारी है।
English Explanation:
In this section of Tantrasar, initiation (diksha) is introduced as a profound spiritual process rather than a mere ritual.
Before explaining the nature of initiation, the text emphasizes the importance of "snana" (purification).
Here, purification does not mean physical bathing. Instead, it refers to inner transformation.
True purity (shuddhata) is defined as the absorption into the nature of the Supreme Consciousness (Parameshvara).
This means that as long as a person identifies with the body, mind, or ego, they remain in a limited and impure state.
However, when one realizes their true nature as universal consciousness, they attain real purity.
Thus, "snana" symbolizes:
- Cleansing of ignorance
- Dissolution of ego
- Expansion into universal awareness
This inner purification prepares the aspirant for initiation.
Diksha, therefore, is not just a ritual but a shift in consciousness — from limitation to unity.
तंत्रसार (१२.३–१२.५) — शुद्धि का रहस्य
कालुष्यापगमो हि शुद्धिः कालुष्यं च तदेकरूपेऽपि अतत्स्वभावरूपान्तरसंवलनाभिमानः ॥ १२.३
तद् इह स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारे स्वात्मनि विश्वत्रापि वा तदन्यरूपसंवलनाभिमानः अशुद्धिः सा च महाभैरवसमावेशेन व्यपोह्यते सोऽपि कस्यचित् झटिति भवेत् कस्यापि उपायान्तरमुखप्रेक्षी ॥ १२.४
तत्रापि च एकद्वित्र्यादिभेदेन समस्तव्यस्ततया क्वचित् कस्यचित् कदाचित् च तथा आश्वासोपलब्धेः विचित्रो भेदः ॥ १२.५
शुद्धि क्या है?
शुद्धि का अर्थ है — अशुद्धि (कालुष्य) का समाप्त हो जाना।
अशुद्धि क्या है? — जब आत्मा एक ही स्वरूप में होते हुए भी अपने वास्तविक स्वरूप के अतिरिक्त किसी अन्य रूप को अपना मान लेती है, वही अशुद्धि है।
अशुद्धि कैसे होती है?
जब आत्मा जो कि स्वतन्त्र, आनन्दमय और चैतन्य स्वरूप है — वह स्वयं को शरीर, मन या संसार के रूप में मान लेती है, तो यह अशुद्धि उत्पन्न होती है।
शुद्धि कैसे होती है?
यह अशुद्धि ‘महाभैरव’ (परम शिव) के समावेश से समाप्त हो जाती है।
कुछ साधकों को यह अनुभूति तुरंत (झट से) प्राप्त होती है, जबकि कुछ को साधना, उपाय या मार्ग के द्वारा धीरे-धीरे प्राप्त होती है।
अनुभव में भिन्नता क्यों?
यह अनुभव हर व्यक्ति में अलग-अलग प्रकार से होता है —
कभी एक बार में, कभी धीरे-धीरे, कभी पूर्ण रूप से, कभी आंशिक रूप में।
इसलिए साधना और अनुभव में विविधता स्वाभाविक है।
What is Purity (Shuddhi)?
Purity is simply the removal of impurity (Kalushya).
What is Impurity?
Even though the Self is inherently pure and one, impurity arises when it falsely identifies itself with something other than its true nature (like body, mind, or external world).
Core Idea:
The Self is pure consciousness (Chit), full of bliss and freedom.
But when it overlays itself with false identities, it becomes "impure" in perception.
How is impurity removed?
Through the realization or immersion into Mahabhairava (Supreme Consciousness / Shiva).
Modes of Realization:
- Instant awakening (sudden enlightenment)
- Gradual realization (through practices and methods)
Why different experiences?
Because each individual has different levels of readiness, awareness, and conditioning.
Thus realization may occur:
- instantly
- gradually
- partially
- fully
This explains the diversity in spiritual paths and experiences.
तंत्रसार 12.3–12.6 | शुद्धि और स्नान का रहस्य
कालुष्यापगमो हि शुद्धिः कालुष्यं च तदेकरूपेऽपि अतत्स्वभावरूपान्तरसंवलनाभिमानः ॥ १२.३ ॥
अशुद्धता का नाश ही शुद्धि है। और अशुद्धता यह है कि एक ही स्वरूप (आत्मा) होते हुए भी, उससे भिन्न किसी अन्य रूप को अपना मान लेना।
Purity is defined as the removal of impurity. Impurity arises when the self, though inherently one, identifies itself with something that is not its true nature. This false identification creates limitation and bondage.
तद् इह स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारे स्वात्मनि विश्वत्रापि वा तदन्यरूपसंवलनाभिमानः अशुद्धिः सा च महाभैरवसमावेशेन व्यपोह्यते सोऽपि कस्यचित् झटिति भवेत् कस्यापि उपायान्तरमुखप्रेक्षी ॥ १२.४ ॥
स्वतंत्र आनंदरूप चैतन्य आत्मा में या सम्पूर्ण विश्व में, किसी अन्य रूप का अभिमान करना अशुद्धि है। यह अशुद्धि महाभैरव (परम चेतना) में लीन होने से नष्ट होती है। यह किसी को तुरंत होती है, और किसी को उपायों के माध्यम से।
Impurity is the misidentification of the pure conscious self with something else. This impurity is destroyed by merging into the supreme consciousness (Mahabhairava). For some, realization happens instantly, while others require spiritual practices.
तत्रापि च एकद्वित्र्यादिभेदेन समस्तव्यस्ततया क्वचित् कस्यचित् कदाचित् च तथा आश्वासोपलब्धेः विचित्रो भेदः ॥ १२.५ ॥
इस अनुभव में भी विभिन्न प्रकार के भेद होते हैं — एक, दो, तीन या अनेक रूपों में; कभी समग्र रूप में, कभी आंशिक रूप में; और यह विभिन्न व्यक्तियों में अलग-अलग समय पर अनुभव होता है।
Even in realization, there are variations. Some experience it partially, some fully, and at different times. The diversity in spiritual experience depends on the readiness of the practitioner.
स च अष्टधा क्षितिजलपवनहुताशनाकाशसोमसूर्यात्मरूपासु अष्टासु मूर्तिषु मन्त्रन्यासमहिम्ना परमेश्वररूपतया भावितासु तादात्म्येन च देहे परमेश्वरसमाविष्टे शरीरादिविभागवृत्तेः चैतन्यस्यापि परमेश्वरसमावेशप्राप्तिः कस्यापि तु स्नानवस्त्रादितुष्टिजनकत्वात् परमेशोपायताम् एतीति उक्तं च श्रीमदानन्दादौ धृतिः आप्यायो वीर्यं मलदाहो व्याप्तिः सृष्टिसामर्थ्यं स्थितिसामर्थ्यम् अभेदश् च इत्य् एतानि तेषु मुख्यफलानि तेषु तेषु उपाहितस्य मन्त्रस्य तत्तद्रूपधारित्वात् ॥ १२.६ ॥
पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, चन्द्र और सूर्य — इन आठ रूपों में परमेश्वर का ध्यान कर, मंत्रन्यास द्वारा शरीर को परमेश्वरमय बनाया जाता है। इससे साधक का चैतन्य भी परमेश्वर में लीन हो जाता है। स्नान आदि भी इस हेतु साधन बन सकते हैं।
By meditating on the eight forms of existence (earth, water, air, fire, space, moon, sun), and through mantra placement, the body becomes divine. This leads to union with the Supreme. Even simple acts like bathing can become spiritual tools when done with awareness.
तंत्रसार 12.7–12.10 | वीर साधना और आंतरिक स्नान
वीरोद्देशेन तु विशेषः तद् यथा रणरेणुः वीराम्भः महामरुत् वीरभस्म श्मशाननभः तदुपहितौ चन्द्रार्कौ आत्मा निर्विकल्पकः ॥ १२.७ ॥
वीर साधकों के लिए विशेष विधि है — रणभूमि की धूल, वीर का जल, महान वायु, वीर भस्म, श्मशान का आकाश — इन सबको दिव्य मानकर चन्द्र और सूर्य सहित आत्मा को निर्विकल्प रूप में अनुभव करना।
For advanced practitioners (Veera), special methods are described. Elements like battlefield dust, sacred ash, wind, and space are seen as divine. Through this, the practitioner realizes the self beyond duality (nirvikalpa state).
पुनर् अपि बाह्याभ्यन्तरतया द्वित्वम् बहिरुपास्यमन्त्रतादात्म्येन तन्मयीकृते तत्र तत्र निमज्जनम् इत्य् उक्तम् ॥ १२.८ ॥
बाहरी और आंतरिक — दोनों रूपों में साधना होती है। बाहरी रूप में उपास्य मंत्र के साथ एकत्व बनाकर उसमें लीन होना ही साधना है।
Spiritual practice exists in both external and internal forms. Externally, the practitioner merges with the mantra and object of worship, becoming one with it.
विशेषस् तु आनन्दद्रव्यं वीराधारगतं निरीक्षणेन शिवमयीकृत्य तत्रैव मन्त्रचक्रपूजनम् ततः तेनैव देहप्राणोभयाश्रितदेवताचक्रतर्पणम् इति मुख्यं स्नानम् ॥ १२.९ ॥
विशेष साधना में, आनंदस्वरूप तत्व को देखकर उसे शिवमय बनाना, फिर उसी में मंत्रचक्र की पूजा करना, और देह व प्राण में स्थित देवताओं का तर्पण करना — यही वास्तविक स्नान है।
The deeper practice involves perceiving bliss as divine (Shiva), performing mantra worship within it, and offering energy to the deities within body and life-force. This is considered the highest form of purification (inner bath).
आभ्यन्तरं यथा तत्तद्धरादिरूपधारणया तत्र तत्र पार्थिवादौ चक्रे तन्मयीभावः ॥ १२.१० ॥
आंतरिक रूप से साधक विभिन्न तत्वों (जैसे पृथ्वी आदि) का ध्यान करके, उनके चक्रों में तन्मय हो जाता है।
Internally, the practitioner assumes the forms of elements (like earth, water, etc.) and becomes one with them within the subtle energy centers (chakras).

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