शब्द-ब्रह्म और नाद-योग: ब्रह्मांड की उत्पत्ति से अष्टसिद्धि और जीवन-साधना का रहस्य

"आपकी दिव्य और अद्भुत प्रेरणा प्राप्त करने के लिये कि आप के दिखाये मार्ग पर चलने के लिये मैं तैयार हूँ, न केवल प्रेरणा प्राप्त करने के लिये यद्यपि आपकी भक्ती और उपासना से उर्जा रूप शक्ति उत्साह धैर्य पराक्रम को भी प्राप्त करने के लिये। आपकी उत्तम श्रेष्ठ प्रेरणा और कृपा दृष्टी से आप मुझे मेरे जीवन के परम लक्ष्य तक पहुंचने का सामर्थ प्रदान किजीये।"


भूमिका: ब्रह्मांड का प्रादुर्भाव और पंचभौतिक तत्व

इस विश्व ब्रह्माण्ड के उद्भव से पहले केवल एक अदृश्य शक्ति परमेश्वर के रूप में विद्यमाम थी। उसने इच्छा की—"मैं अनन्त रूपों में हो जाऊ।" उस अदृश्य परमेश्वर ने एक बृहद्त्तम उद्घोश रूप शब्द 'ओ३म्' का उच्चारण किया, जो परमेश्वर का निज नाम है। शब्द को भी ईश्वर कहते हैं। इस नाम के उच्चारण मात्र से अदृश्य जगत से दृश्य जगत में बहुत सूक्ष्म एक अणु का सृजन हुआ, जिसमें प्रथम ब्रह्म कण, दूसरा विष्णु कण और तीसरा महेश कण कहलाया। यह एक परमाणु बन गया, और यह ब्रह्म कण निरंतर विस्तार करने लगा, जिससे आकाश का जन्म हुआ, जिससे मन बना और उसी एक मन को अनन्त ब्रह्माण्डों का गर्भ कह सकते हैं।

यह उस परमेश्वर के लिये कच्चे मैटेरियल (कच्ची सामग्री) की भांति था, जिससे ही उसने अनन्त किस्म की इस अद्भुत जगत की रचना की। जैसा कि हमारे प्राचीनतम शास्त्रों में आता है कि अग्नि, वायु, जल, आकाश और पृथ्वी—ये पांच प्राकृतिक भौतिक दृश्यमय पदार्थ हैं। जल एक ऐसा पदार्थ है जिसमें आग और हवा दोनों समाहित हैं। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन एक ज्वलनशील पदार्थ है जो ऑक्सीजन के परमाणु के साथ अभिक्रिया करके जल (H₂O) बनाता है। पानी के एक परमाणु में दो तत्व हैं—आग और हवा, तीसरा स्वयं जल है, चौथा तत्व आकाश है (इनके मध्य में ही विद्यमान है) और पांचवा तत्व यह पृथ्वी है, जो इन चारों के मेल से बनी है।


भाग १: ग्रहों पर जीवन का इतिहास और अनियंत्रित काम का सत्य

शुक्र, बृहस्पति और मंगल से पृथ्वी तक की यात्रा

सर्वप्रथम ज्वलनशील गैसें थीं, जिन्होंने आगे चल कर अग्नि का रूप धारण किया जिनसे बहुत सारे तारों का उदय हुआ। इन तारों से अनन्त ग्रहों का उद्भव हुआ। अरबों-खरबों साल पहले सर्वप्रथम शुक्र ग्रह पर वायुमंडल निर्मित किया गया, उसके बाद वहां वनस्पति युग आया। उसके उपरान्त देव युग और फिर मनु युग आया। मन विशुद्ध रूप से ब्रह्म के स्वरूप का साक्षात्कार करके उनसे एकात्म कर सकता है और यही मन प्रकृति के मुख्य देवता महेश से भी जुड़कर दृश्यमय जगत का सृजन कर सकता है।

मनुष्य अपनी अवनती और भौतिक आसक्ति के कारण एक ग्रह को नष्ट करता हुआ दूसरे ग्रह पर अपना निवास बनाता रहा। शुक्र ग्रह के वायुमंडल को नष्ट करके वह बृहस्पति पर गया। वहां के संसाधनों का दोहन करके वह मंगल ग्रह पर आया और अंत में जब वहां के भी जैविक संसाधन अंत हो गए, तो वह पृथ्वी पर आया।

सृष्टि के संचालक और काम-क्रोध का शत्रु रूप

पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ एक होकर ज्ञान के द्वारा सभी जीव-जन्तुओं का पुनः सृजन हुआ। यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीन पुरुष हुए। ब्रह्मा जी के दो पुत्र हुए—एक यक्ष (पवित्र यज्ञ कर्म करने वाले) और दूसरे रक्ष (यज्ञ की रक्षा करने वाले), जो आगे चलकर देवता और दैत्य के रूप में विख्यात हुए।

योगेश्वर कृष्ण गीता में कहते हैं:
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्धव:। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।37।।
अर्थात्, रजोगुण से उत्पन्न यह काम ही है, जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी महान पापी शत्रु है। जीवात्मा का सबसे बड़ा शत्रु अनियंत्रित काम है।

भाग २: वैदिक महामंत्र और प्राणायाम (वायु विज्ञान)

ओ३म् इषेत्वर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणऽआप्यायध्वन्याऽइन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवाऽअयक्षमा मा वस्तेनऽईशत माघँसो ध्रुवाऽअस्मिन गोपतऔ स्यात बह्वीर्यजमानस्य पशून्पाहि।।

इस मंत्र में जीव प्रभु से प्रार्थना करता है कि मैं आपके चरणों में दिव्य प्रेरणा, ऊर्जा, उत्साह, धैर्य और पराक्रम प्राप्त करने के लिए उपस्थित हुआ हूँ। इस मंत्र के ऋषि प्रजापति और देवता सविता (सबके गुरु परमेश्वर) हैं।

१. वायवः स्थ = प्राणायम विज्ञान

प्राणायाम (प्राण + आयाम) का शाब्दिक अर्थ है—'प्राण या जीवनी शक्ति को आयाम देना या उलटा गमन कराना'। शास्त्रों में कहा गया है:
"चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्।" अर्थात प्राणों के चलायमान होने पर चित्त भी चलायमान हो जाता है और प्राणों के निश्चल होने पर मन भी स्वतः निश्चल हो जाता है।

  • भस्त्रिका प्राणायाम: फेफड़ों में गहरी सांस भरकर छोड़ना। यह हृदय, फेफड़ों और मस्तिष्क से सम्बंधित सभी व्याधियों को मिटाता है।
  • कपालभाति प्राणायाम: सांस को बलपूर्वक बाहर फेंकना और पेट को अंदर करना। इसे 'धरती की संजीवनी' कहा जाता है, जो मोटापा, मधुमेह, और त्वचा रोगों को समूल नष्ट करता है।
  • बाह्य प्राणायाम: त्रिबंध (जालंधर, उड्डियान और मूल बंध) लगाकर सांस को बाहर रोकना। यह उदर रोगों और एकाग्रता के लिए अचूक है।
  • अनुलोम-विलोम प्राणायाम: इड़ा (चन्द्र) और पिंगला (सूर्य) नाड़ियों का शोधन कर शरीर का तापमान संतुलित करता है और ७२,७२,१०,२१० सूक्ष्म नाड़ियों को शुद्ध करता है।

भाग ३: सुषुम्ना नाड़ी, अष्टचक्र और अष्टसिद्धियाँ

इड़ा और पिंगला के मध्य सुषुम्ना (सरस्वती) नाड़ी स्थित है। अथर्ववेद के अनुसार मानव शरीर में आठ चक्र (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहस्रार और ब्रह्मरन्ध्र) स्थित हैं। इन चक्रों को जाग्रत करने से साधक को आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:

अणिमा लघिमा गरिमा प्राप्ति: प्राकाम्यंमहिमा तथा। ईशित्वं च वशित्वंच सर्वकामावशायिता:।।
सिद्धि का नाम विशेषता और प्रभाव
अणिमाअपने आकार को अणु समान सूक्ष्म बना लेने की क्षमता।
महिमाअपने शरीर को विशाल और ब्रह्मांड की भांति विस्तृत कर लेना।
गरिमाशरीर को अत्यधिक भारी बना लेना जिसे कोई हिला न सके।
लघिमास्वयं को पंख से भी हल्का कर लेना और सुदूर गमन करना।
प्राप्तिअसंभव वस्तुओं (जैसे मरुस्थल में अमृत) को भी इच्छा मात्र से पा लेना।
प्राकाम्यकोई भी रूप धारण कर लेना, आकाश में उड़ना या जल पर चलना।
ईशित्वसमस्त प्रकृति, जीव और साम्राज्यों पर प्रभुत्व स्थापित करना।
वशित्वजीवन, मृत्यु, जड़ और चेतन को अपने पूर्ण वश में कर लेना।

भाग ४: शब्द ब्रह्म, नाद योग और जीवन-साधना

ओंकार ही शब्दब्रह्म और नादब्रह्म की धुरी है। महती स्फोट प्रक्रिया से ही इस जगत की उत्पत्ति हुई है। सविता देवः वः श्रेष्ठतमाय कर्मणे प्रार्पयतु—अर्थात ईश्वर की श्रेष्ठ प्रेरणा से हमारी वाणी परिष्कृत होकर 'वाक्' शक्ति बनती है।

वाणी की पवित्रता के लिए आहार की सात्विकता परम आवश्यक है। अभक्ष्य, उत्तेजक मसालों और नशीले पदार्थों से जिव्हा की सूक्ष्म आत्मिक शक्ति नष्ट हो जाती है। जब हमारा अन्तःकरण शुद्ध होता है, तो हमारे मुख से निकलने वाले वाक्य 'आप्त वाक्य' (सिद्ध वचन) बन जाते हैं।

आध्यात्मिक बोध कथाएँ और उनके निष्कर्ष

१. राजकुमार शक्तिधर का बलिदान (वीरवर की कथा): राजा शूद्रक के राज्य की रक्षा के लिए राजकुमार वीरवर ने अपने बत्तीस लक्षणों से युक्त पुत्र शक्तिधर और स्वयं का बलिदान दे दिया। यह कथा सिखाती है कि श्रेष्ठ कार्यों और परोपकार के लिए प्राणों का त्याग भी प्रशंसनीय है—"सन्निमित्ते वरंत्यागो विनाशे नियते सति।"

२. महाकंजूस राजेश का हृदय परिवर्तन: एक कटोरी खो जाने पर तीन दिन भूखा रहने वाला कंजूस व्यक्ति जब वेदमंत्रों की वैज्ञानिक कथा सुनता है, तो उसकी सुप्त श्रद्धा जाग्रत हो जाती है। वह अपने जीवन की समस्त अमूल्य संपत्ति, हीरे-जवाहरात यज्ञ में दान कर देता है। यह प्रमाणित करता है कि आदर धन का नहीं, अपितु मनुष्य के महान 'त्याग' और 'दान' का होता है।


भाग ५: 'अघ्न्याः'—अहिंसा का वास्तविक सनातन स्वरूप

परमेश्वर का संदेश है—'अघ्न्याः' अर्थात तुम अहिंसक बनो। परंतु अहिंसा का वास्तविक अर्थ केवल 'हिंसा न करना' नहीं है। महाभारत में महर्षि व्यास कहते हैं—"अंहिसा सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोह:" अर्थात् मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी के प्रति द्रोह न करना ही सच्ची अहिंसा है।

परंतु, जहां धर्म और राष्ट्र की रक्षा का प्रश्न हो, वहां शस्त्र उठाना कायरतापूर्ण अहिंसा से श्रेष्ठ माना गया है, जैसा कि स्कन्द पुराण और गीता के उपदेशों से स्पष्ट है। शास्त्र कहते हैं—

"अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च: l"

अर्थात यदि अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है, तो धर्म, राष्ट्र, स्त्री और संस्कृति की रक्षा के लिए की गई न्यायोचित हिंसा उससे भी श्रेष्ठ कर्म है।

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अध्याय ३: मत्स्य न्याय और व्यवस्था की नग्न क्रूरता