Sukta 34 लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैंसभी दिखाएं
अथर्ववेद 4.34 – यज्ञ और विष्टारिण-मन्त्र – सुरक्षा, समृद्धि और लोकहित
अध्याय १०: अमृत का सृजन और नए यूनिवर्सल मानव का प्रादुर्भाव (Creation of Amrit & Birth of the New Universal Human