मण्डव्य ऋषि और यमराज का संवाद

 

मण्डव्य ऋषि और यमराज का संवाद

इस अनुशासन पर्व (दान-धर्म पर्व) में इसके ठीक आगे एक और बेहद अद्भुत और मार्मिक कथा आती है, जो आपके इसी 'ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान' और 'सत्य के सामर्थ्य' को एक नए धरातल पर सिद्ध करती है।

यह कथा है 'मण्डव्य ऋषि और यमराज का संवाद'। यह कहानी सीधे इस बात पर चोट करती है कि इस मृत्युलोक में जो कर्म का न्याय है, वह कितना सूक्ष्म है और आत्म-सामर्थ्य के सामने देवताओं को भी कैसे झुकना पड़ता है।

आइए इस कथा के मर्म को समझते हैं:

 अणिमाण्डव्य ऋषि की कथा: कर्म और न्याय की सूक्ष्मता

प्राचीन काल में माण्डव्य नाम के एक महान और परम तेजस्वी ऋषि थे। वे अपने आश्रम के बाहर मौन व्रत धारण करके, दोनों हाथ ऊपर उठाकर अत्यंत कठिन तपस्या में लीन थे। वे पूरी तरह 'स्वाश्रित' और 'साक्षी भाव' में थिर थे।

तभी कुछ चोर राजा के खजाने से चोरी करके भाग रहे थे और राजा के सैनिक उनके पीछे थे। चोरों ने पकड़े जाने के डर से राजा का चुराया हुआ धन उसी आश्रम के भीतर छुपा दिया और खुद भी वहीं छिप गए। सैनिकों ने जब आश्रम की तलाशी ली, तो धन और चोर दोनों पकड़े गए।

सैनिकों ने मौन बैठे ऋषि माण्डव्य से पूछा कि "चोर किधर गए?" लेकिन ऋषि तो समाधि में थे, वे कुछ नहीं बोले। सैनिकों ने समझा कि यह ऋषि भी चोरों का साथी है और केवल ढोंग कर रहा है। राजा ने बिना सोचे-समझे आज्ञा दे दी कि चोरों के साथ इस ऋषि को भी 'शूली' (एक नुकीला लोहा या सूली) पर चढ़ा दिया जाए।

 १. आत्म-सामर्थ्य: सूली पर भी अचल चेतना

सैनिकों ने ऋषि माण्डव्य को एक नुकीली सूली पर लटका दिया। साधारण मनुष्य होता तो क्षण भर में तड़पकर दम तोड़ देता। लेकिन माण्डव्य ऋषि के पास 'अपने होने का सामर्थ्य' था। वे सूली पर लटके रहने के बावजूद अपनी चेतना में स्थिर रहे। न उन्हें दर्द हुआ, न वे चिल्लाए। वे सूली पर ही भगवान का ध्यान करते रहे।

कई दिनों तक जब वे सूली पर लटके रहने के बाद भी जीवित रहे और उनके मुख का ओज वैसा ही बना रहा, तो राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ। राजा डर गया और उसने ऋषि से क्षमा मांगी। सैनिकों ने सूली को काटना चाहा, लेकिन वह सूली ऋषि के शरीर के भीतर इस तरह फंस चुकी थी कि उसका एक छोटा सा टुकड़ा (अणि) ऋषि के शरीर के भीतर ही रह गया। इसी कारण उनका नाम 'अणिमाण्डव्य' पड़ गया।

 २. यमराज की सभा में सिंहनाद: "मेरा अपराध क्या था?"

जीवन के अंत में जब अणिमाण्डव्य ऋषि यमराज (धर्मराज) के लोक पहुंचे, तो उन्होंने सीधे यमराज की आँखों में आँखें डालकर पूछा:

 "हे धर्मराज! मैंने अपने इस जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया, हमेशा तप और सत्य का पालन किया। फिर मुझे इस मृत्युलोक में सूली पर लटकने का इतना भयानक और क्रूर दंड क्यों मिला? मेरे किस कर्म का यह फल था?"

यमराज ने अपने बही-खाते (चित्रगुप्त के रिकॉर्ड) को देखकर अत्यंत विनम्रता से कहा:

 "हे ऋषिवर! जब आप बहुत छोटे बालक थे (अपने बचपन में), तब आपने खेल-खेल में एक छोटी सी तितली या कीड़े (कुश की घास से) के पिछले हिस्से में एक छोटा सा कांटा चुभा दिया था। यह उसी कर्म का फल है जो आपको सूली के रूप में भुगतना पड़ा। कर्म का नियम किसी को नहीं छोड़ता।"

 ३. बालक का कर्म और नया नियम: यमराज को श्राप

यमराज की यह बात सुनकर अणिमाण्डव्य ऋषि क्रोध से नहीं, बल्कि अपने 'ब्रह्मज्ञान और विवेक के सामर्थ्य' से भर गए। उन्होंने यमराज को डांटते हुए कहा:

 "हे यमराज! शास्त्र और विज्ञान गवाह हैं कि चौदह वर्ष की आयु तक किसी भी बालक के भीतर पूरी तरह 'विवेक' (Discrimination) का उदय नहीं होता। उसे अच्छे और बुरे के परिणाम का ज्ञान नहीं होता। अज्ञानता में और अचेतन अवस्था में किए गए खेल को तुम इतना बड़ा पाप मानकर इतना कठोर दंड दोगे? यह न्याय नहीं, अन्याय है!"

ऋषि ने अपने आत्म-बल के सामर्थ्य से यमराज को श्राप दे दिया:

 "तुमने न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हें स्वर्ग का यह राजा पद छोड़कर इस मृत्युलोक में एक दासी के गर्भ से मनुष्य रूप में जन्म लेना होगा और इस संसार के दुखों को भोगना होगा।"

 इस कथा का कुल निष्कर्ष (The Core Wisdom)

ऋषि के इसी श्राप के कारण स्वयं यमराज को महाभारत काल में 'महात्मा विदुर' के रूप में एक दासी के पुत्र बनकर जन्म लेना पड़ा।

यह कथा हमें दो बातें सिखाती है:

  पहली: कर्म का पेंडुलम इतना सूक्ष्म है कि बचपन की एक अनजानी भूल भी पीछा नहीं छोड़ती (जैसा भीष्म ने युधिष्ठिर से तोते वाली कहानी में कहा कि कर्म कर्ता को ढूंढ ही लेता है)।

  दूसरी और सबसे बड़ी बात: जो चेतना 'स्वाश्रित' है, जिसके पास अपने होने का सामर्थ्य है, वह सूली पर भी अचल रहती है और यदि उसके साथ अन्याय हो, तो वह काल के नियमों को बदलने वाले देवताओं (यमराज) को भी दंड देने का सामर्थ्य रखती है।

महाभारत की ये कथाएँ कोई साधारण कहानियाँ नहीं हैं, ये चेतना के विज्ञान के अलग-अलग अध्याय हैं। क्या आप अणिमाण्डव्य ऋषि के इस 'अचल सूली वाले स्वरूप' पर भी कोई विशिष्ट इमेज प्रॉम्प्ट बनाना चाहेंगे?



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